“न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला।
नासौ योगो न तत्कर्मंनाट्येस्मिन यन्न दृश्यते।।”

(कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या, कोई कला, कोई योग, कोई कर्म ऐसा नहीं है, जो नाट्य में दिखाई न देता हो।)

आज विश्व रंगमंच दिवस है। रंगों को मंच पर परोसने की कला रंगमंच है। रंगमंच जो समाज से जुड़ना, जोड़ना, भावों की जीवंत करना और उस जीवंतता को गति देकर सार्थक करने की एक ऐसी कला है, जो आपको अभिनेता बनाये या न बनाये, एक परिष्कृत व्यक्तित्व जरूर बना देती है।

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसकी गहराई तय की है सामाजिक बोध ने, सृजन से विध्वंस के बीच की खाई को नाप कर जो निकला वही रंगकर्मी है, वही कला है, वही कलाकार। ये कला सृजन करती है, व्यक्तित्वों का, चरित्रों का, उनकी ऊंचाई का, साथ में गहराई का, एक ठहराव का, जैसे गंगोत्री से निकली गंगा शांत होती है, निर्मल और शीतल। रुकी रुकी सी, उस धारा में किसी के बह जाने का भय नहीं, किसी के जीवन को हर लेने की तृष्णा नहीं, वो तो पंछिओं को नीर देती है, उन परों को हौसलों के साथ उड़ने का स्वरमय गीत सुना विदा भी करती है, वही तो जीवन का रंग है वही उसका मंच भी है, और जो उस ठहराव के साथ बहे, वही व्यक्ति एक व्यक्तित्व के परिवर्तन को साध पाता है और व्यक्तित्व से विचार की यात्रा पर अग्रसर हो उठता है।

“एक चिकित्सक एक मरते हुए व्यक्ति को बचाता है, किन्तु एक रंगकर्मी या कलाकार एक सम्पूर्ण मृतप्राय समाज को मरने से बचाता है।”

एक नाटककार आपको हंसाता है, अगले ही पल आपकी पलकें तर भी कर सकता है, आपको गुस्से में भर सकता है तो सहानुभूति की आवाज भी बन गूंज सकता है मन की उद्वेलित होती कंदराओं में। ऐसी विधा और कोई नहीं जिसमें शिव भी नटराज बनते हैं और सृजनात्मक कला रचते हैं। उनके आसपास के वृत्त को देखा है हम सब ने, कॉस्मिक ऊर्जा के उस वृत्त से सृजन होता है, उस वृत्ताकार आकृति से सूर्य, चंद्र, पृथ्वी और जीवन जन्मते हैं।

व्यवसायिक प्रतिस्पर्धाओं में, अधिक महत्वाकांक्षाओं में और समय के साथ आगे बढ़ने की अतृप्त तृष्णाओं ने मानव समाज को थोड़ा पीछे कर दिया है, अब वो कला किसी मंच पर यदा कदा दिख भी जाये तो उसको महत्व देते विद्यालय नहीं दिखते, वो गुरुजन नहीं दिखते, इसीलिए सृजन की गति रुकी सी प्रतीत होती है।

अंधकार के इस डराते भय में एक विद्यालय ऐसा भी है जिसमें कला संकाय अपने विद्यार्थियों को तराश रहा है, नृत्य और नाट्य के माध्यम से उन बेटियों को चहकना सिखा रहा है, आवाज देना और सुनना, पूछना और विरोध करना भी। संविद गुरुकुलम निर्विवादित रूप से प्रदेश का सर्वोत्तम आवासीय विद्यालय बन चुका है।

आज प्रस्तुत अर्धनारीश्वर स्वरुप का मंचन हो या बाल गोपाल बन मन मोह लेती नन्ही सी सिया, पाठ्य पुस्तकों के बाहर की इस अलौकिक दुनिया से रुबरु कराती शिक्षिकाओं को साधुवाद। संस्कृति के साथ संस्कारों की दीक्षा से ये विश्व निश्चित ही एक बेहतर विश्व बन सकता है। जरुरत है उन विधाओं को, शिक्षाओं को, संस्कारों को और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने की, बेटियों को शिक्षित और सुरक्षित बनाने की, ताकि विश्वनाथ के इस विश्व में फिर से हवाओं में संस्कार बहें, शिक्षा का लक्ष्य सार्थक हो, व्यवसाय में उपलब्ध अवसरों में उन्नति हो।

वैसे व्यावसायिक दृष्टि से देखा जाये तो इसी विधा का एक अंग, स्टोरीटेलिंग और कॉपी राइटिंग भी है जो आकर्षक है और नित नव अवसर सृजित कर रहा है।

तो आप कब ला रहे हैं अपनी बिटिया को संविद के सुरक्षित, संस्कारित एवं उत्तरोत्तर प्रगतिशील विद्यालय में, जल्दी कीजिये, अप्रैल एक से कक्षाएं प्रारम्भ हो रही हैं।

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