तालिबान का हुआ अफगानिस्तान

आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी और संभावना भी, तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान को अपने कब्जे में कर लिया है. ताजा समाचार यह है कि तालिबान ने बिना किसी विशेष विरोध के समूचे अफगानिस्तान पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया है. तालिबान के सूत्रों ने बताया है कि शीघ्र ही अफगानिस्तान को “इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान” घोषित कर दिया जाएगा.
मैं वैश्विक राजनीति मामलों का विशेषज्ञ तो नहीं हूं लेकिन मुझे यह बड़ा हास्यास्पद लगा कि एक तरफ समझौता वार्ता चलती रही, दुनिया की तमाम तथाकथित शक्तियां वार्ता करती रही और दूसरी तरफ तालिबान अफगानिस्तान के राज्यों पर कब्जा करते हुए काबुल पहुंच गया और और राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करके पूरे अफगानिस्तान पर अपना परचम फहरा दिया. इसके बाद वार्ता ख़त्म. ऐसा लगता है कि यह वार्ता शायद तालिबान को अफगानिस्तान पर विजय सुनिश्चित करने के लिए ही आयोजित की गई थी. किसी भी मुस्लिम देश ने इस पर कोई भी विपरीत प्रतिक्रिया नहीं दी है, तो क्या यह समझा जाए कि पूरा इस्लामिक जगत तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे का समर्थन करता है?
जैसा कि हमेशा होता आया है, संयुक्त राष्ट्र संघ जो पूरे विश्व का मुखिया है वह देखता ही रह गया और देखता ही रहेगा.
ज्यादातर शक्तिशाली देश अपने राजनयिकों और नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने में जुट गए हैं,जिससे स्पष्ट है कि अपने देश के नागरिकों के लिए तो वह अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं लेकिन अफगान नागरिकों के लिए उनके मन में कोई दर्द और पीड़ा नहीं है जिसका मतलब साफ़ है कि उनका मानवता से कोई लेना देना नहीं है.
अफगानिस्तान के समृद्ध और सक्षम लोग पहले ही भाग चुके थे और बचे हुए लोगों में जो लोग देश छोड़ सकते हैं, वह जहां कहीं संभव है भाग रहे हैं. जिनके पास कोई विकल्प नहीं है वह तालिबान का स्वागत कर रहे हैं और उनके समर्थन में तालियां बजा रहे हैं.
इन सभी प्रश्नों का उत्तर हम सभी को ढूंढना होगा.
पूरा घटनाक्रम ऐसा लग रहा है जो शायद 1000 वर्ष पहले भारत में हुआ होगा , आक्रमणकारी आंधी की तरह आते थे और तूफान की तरह विजयी हो जाते थे, कुछ भारतीय राजा लड़ते थे और कुछ बिना लडे ही पराजय स्वीकार कर लेते थे और बड़ी संख्या में लोग तमाशबीन होते थे या आक्रमणकारियों का स्वागत करते थे.
तालिबान का दोबारा अफगानिस्तान पर कब्जा लगभग 20 साल बाद हुआ है और इन 20 सालों में अमेरिका के नेतृत्व में नाटो की सेनाएं अफगानिस्तान में रहीं और उन्होंने तालिबान को रोके भी रखा और अफगान सेनाओं को भविष्य मैं तालिबान की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रशिक्षित भी किया. सबसे आश्चर्यजनक घटना क्रम यह रहा कि तालिबान को पूरे अफगानिस्तान में कहीं भी बहुत ज्यादा प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा और उसकी सबसे आसान विजय काबुल पर रही जहां अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी स्वयं भाग खड़े हुए . उनके जहाज को तजाकिस्तान ने तालिबान के दबाव में ने अपने यहां उतरने की अनुमति नहीं दी. बताया जा रहा है कि वह अब अमेरिका जाएंगे.
तालिबान वस्तुत: एक आतंकवादी संगठन है, जिसने 20 वर्ष पहले भी अफगानिस्तान पर कब्जा करके अमानुषिक कानून लागू कर लोगों पर भयानक अत्याचार किए थे. आज इतने साल बाद भी तालिबान न केवल मौजूद है बल्कि पहले से ज्यादा शक्तिशाली भी है.
यह समझना मुश्किल नहीं
सबसे बड़ी बात अमेरिका ने तालिबान से वार्ता की थी और उसके बाद ही अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला किया था.
क्या तालिबान का कब्जा अमेरिका की डील का एक हिस्सा है?
हो सकता है कि इसके बारे में अफगान सेना के उच्चाधिकारियों को मालूम था इसीलिए तालिबान आतंकवादियों का कोई प्रतिरोध नहीं हुआ और सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया.
यह सही है कि अफगानिस्तान में बने रहना अमेरिका के लिए आर्थिक रूप से बहुत बड़ा बोझ था, लेकिन अचानक अफगानिस्तान की जनता को उसके हाल पर छोड़ देना क्या धोखा देने जैसा नहीं है? क्या अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के लिए नैतिक रूप से यह सही कदम है?
अभी तक अमेरिका के राष्ट्रपति बिडेन इस पर मौन है और उनका मौन रहना ही रहस्य को और गहरा कर रहा है. इस समय अमेरिका सहित विश्व के सभी प्रमुख देश अपने अपने राजनयिकों और नागरिकों से को अफगानिस्तान से निकालने में जी जान से जुट गए हैं. मजे की बात है काफी समय से ज्यादातर देशों के प्रवक्ता “वेट एंड वॉच” की बात कर रहे हैं. अब खेल ख़त्म हो गया है तब भी वही बात कर रहें हैं .
ऐसी हालत में बेचारे अफगान नागरिक जो तालिबान के समर्थक नहीं हैं, मजबूरी में यदि तालिबान का समर्थन करें तो इसमें क्या आश्चर्य होगा?
पिछले तालिबान शासन में सबसे ज्यादा अत्याचार महिलाओं पर हुए थे और वह फिर शुरू हो गए हैं. राज्यों पर कब्जा करते समय ही तालिबान आतंकियों ने अफगान पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से घर की 15 वर्ष से 45 वर्ष की महिलाओं को सौंप देने का हुक्म सुनाया था. स्थानीय मस्जिदों से लाउडस्पीकर द्वारा जनता से भी यही आग्रह किया गया था. अभी तो शुरुआत है.
जहां तक भारत का प्रश्न है, उसने
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– शिव मिश्रा
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