काकोरी कांड के चार नायकों में से दो नायकों (रामप्रसाद बिस्मिल जी और रोशन सिंह जी) के बारे में हम पढ़ चुके है। आज Forgotten Indian Freedom Fighters लेख श्रृंखला की पंद्रहवीं कड़ी में हम पढ़ेंगे तीसरे नायक राजेंद्र लाहिड़ी के बारे में, जी वो ही राजेंद्र लाहिड़ी जी जिनकी मौत के बाद भी अंग्रेज सरकार कांप रही थी और गुपचुप ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया।

काकोरी कांड के चार नायक

राजेन्द्र लाहिड़ी का जन्म तत्कालीन बंगाल प्रान्त के पाबना जिले में 29 जून 1901 को हुआ था।
राजेंद्र के जन्म के समय इनके पिता और बड़े भाई अनुशीलन दल की ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के कारण जेल में बंद थे, यही कारण था कि देशभक्ति एवं राष्ट्रप्रेम की भावना राजेंद्र जी में बचपन से ही कूट कूटकर भरी हुई थी।
देशभक्ति की चिंगारी लेकर राजेंद्र जी 1909 मे 8 वर्ष की आयु में अपने मामा के यहाँ वाराणसी आकर रहने लगे।
वाराणसी में ही उनकी शिक्षा सम्पन्न हुई।

राजेन्द्र जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इतिहास में एम. ए. कर रहे रहे थे तब उनकी मुलाकात बंगाल के क्रांतिकारी ‘युगांतर’ दल के नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई।
राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका “बंग वाणी” के सम्पादन का दायित्व तो दिया ही, साथ ही अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की गुप्त बैठकों में भी आमन्त्रित किया जाने लगा।
शचीन दा के संपर्क में आने से राजेंद्र में राष्ट्रभक्ति की ज्वाला धधकने लगी। जल्द ही आजादी के लिए दीवानगी पनपी तो क्रांतिकारियों की टोली बनाकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशन आर्मी का अस्तित्व सामने आया। बनारस में इस आर्मी की जिम्मेदारी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के कंधों पर थी।

अब वक्त था वर्ष 1925 का, क्रांतिकारी मिशन के लिए देशभक्तों को धन की किल्लत से जूझना पड़ रहा था।
इसलिए शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी। इस मिशन के लिए राजेंद्र लाहिड़ी को सर्वेसर्वा बनाया गया।

इस योजना को अंजाम देने के लिये राजेंद्र ने काकोरी से ट्रेन निकलते ही जंज़ीर खींच कर उसे रोक लिया और 09 अगस्त 1925 को “आठ डाउन सहारनपुर लखनऊ ट्रेन” पर क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने अशफाक उल्ला खाँ और चन्द्रशेखर आजाद व 6 अन्य सहयोगियों की मदद से धावा बोल दिया। कुल 10 क्रांतिकारी साहसी नवयुवकों ने मिलकर ट्रेन में जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। सबसे बड़ी बात ये कि उसी ट्रेन में सफर कर रहे अंग्रेज सैनिकों तक की हिम्मत न हुई कि वे मुकाबला करने को आगे आते। इस कांड से ब्रिटेन की महारानी का सिंहासन हिल गया था।

क्रम संख्या 11 पर राजेन्द्र लाहिड़ी जी

काकोरी कांड के बाद राजेन्द्र को बिस्मिल जी ने बम बनाने के प्रशिक्षण हेतु कलकत्ता भेज दिया। कलकत्ता के पास ही दक्षिणेश्वर में वे बम बनाने का अभ्यास कर रहे थे। एक दिन किसी साथी की जरा-सी असावधानी से एक बम अचानक ब्लास्ट हो गया। इसकी तेज़ धमाकेदार आवाज़ को पुलिस ने सुन लिया और तुरंत ही मौके पर पहुँच कर वहा मौजूद 9 लोगों के साथ राजेन्द्र को गिरफ्तार कर लिया।
उन पर मुकदमा दायर किया और 10 वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर 5 वर्ष की कर दी गयी। बाद में ब्रिटिश राज ने दल के सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों पर काकोरी काण्ड के नाम से मुकदमा दायर करते हुए सभी पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का आरोप लगाया और झूठी गवाहियाँ व मनगढ़न्त प्रमाण पेश कर उसे सही साबित भी कर दिखाया।

राजेन्द्र लाहिड़ी को काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये बंगाल से लखनऊ लाया गया। अंग्रेज़ी हुकूमत ने उनकी पार्टी ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर साम्राज्य के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया। इसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां तथा ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सज़ा सुनायी गयी।

अदालत ने 6 अप्रैल 1927 को फैसला सुनाते हुए क्रांतिकारियों के लिए फांसी की तारीख 19 दिसंबर 1927 को तय की थी, लेकिन काकोरी कांड ने राजेंद्र जी को जननायक बना दिया था। अंग्रेज हुकूमत को खौफ था कि तयशुदा तारीख पर फांसी देने पर हिंदुस्तान की जनता उमड़ सकती है। इसी खौफ के कारण अंग्रेजों ने तय तारीख से दो दिन पहले यानी 17 दिसम्बर 1927 को राजेंद्र लाहिड़ी जी को गोंडा की जिला जेल में फांसी दे दी और गुपचुप तरीके से ही उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।

बताया जाता है कि फांसी की सजा मिलने के बाद भी राजेन्द्र हमेशा की तरह अपना सारा समय व्यतीत करते थे। उनकी दिनचर्या में कोई भी बदलाव नहीं आया था और वो नियमित रूप से कसरत करते थे।
इसे देख एक दिन जेलर ने उनसे सवाल किया कि,
“पूजा-पाठ तो ठीक हैं लेकिन ये कसरत क्यों करते हो, अब तो फांसी लगने वाली हैं तो ये क्यों कर रहे हो?”

तब जेलर को जवाब देते हुए राजेन्द्र जी ने कहा,
“अपने स्वास्थ के लिए कसरत करना मेरा रोज़ का नियम हैं और मैं मौत के डर से अपना नियम क्यों छोड़ दूँ?
यह कसरत अब मैं इसलिए करता हूँ क्योंकि मुझे दूसरे जन्म में विश्वास है और मुझे दूसरे जन्म में बलिष्ठ शरीर मिले इसलिए करता हूँ, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य को मिट्टी में मिला सकूँ“…..मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ”

गोंडा जिले के बाहर राजेंद्र जी की प्रतिमा एवं शिलापट्ट

भारत की स्वतंत्रता में अपनी ज़िंदगी को आहुत कर देने वाले ऐसे महान क्रांतिकारी भारत माँ के वीर सपूत राजेंद्र जी को हमारा शत् शत् नमन।
जय हिंद
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