11 जून 1897 के दिन ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ था और काकोरी कांड 1927 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का व्यक्तित्व बहुआयामी था वे क्रांतिकारी , देशभक्त , शायर, कवि ,सामाजिक कार्यकर्ता हर रूप में ढले हुए थे। सम्भवतः राम प्रसाद बिस्मिल ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपने लिए हथियार भी किताबें बेचकर खरीदे थे।

इतना ही नहीं, 30 साल के जीवनकाल में उसकी कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से एक भी गोरी सत्ता के कोप से नहीं बच सकीं और सारी की सारी जब्त कर ली गयीं. हां, इस लिहाज से वह भारत तो क्या, संभवतः दुनिया का पहला ऐसा क्रांतिकारी था, जिसने क्रांतिकारी के तौर पर अपने लिए जरूरी हथियार अपनी लिखी पुस्तकों की बिक्री से मिले रुपयों से खरीदे थे।


इतिहासकारों के मुताबिक राम प्रसाद बिस्मिल पहले कांग्रेस के साथ मिलकर देश सेवा का काम कर रहे थे मगर असहयोग आंदोलन की असफलता से खिन्न होकर उन्होंने चंद्रशेखर आजाद की हिंदुस्तान रिपब्लिकन पार्टी को ज्वाइन किया और सशस्त्र क्रांति का हिस्सा चुना। 


लेकिन जैसा कि हर क्रांतिकारी के साथ हिंदुस्तान में होता है वैसा ही राम प्रसाद बिस्मिल के परिवार के साथ भी हुआ उनकी शहादत के बाद गरीबी ने उनके परिवार को खून के आंसू रुला दिए। जीवन यापन के लिए उनकेेे परिवार को अपना शाहजहांपुर स्थित घर और सोने के गहने बेच देने पड़े। उनके घर का गुजारा बिस्मिल की दादी को मिले दान से चलता था। अपनी दुस्सह निर्धनता के दिनों में उन्हें धार्मिक आस्था वाले लोगों के उस दान पर निर्भर करना पड़ा था, जो एकादशी आदि पर शहीद की दादी नहीं, ब्राह्मणी होने के चलते उन्हें मिल जाता था।

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