बिहार में वही नीतीश, लालू वही राम विलास सब एक ही दल से निकले हुए हैं किताबी ज्ञान भले ही हो पर राज्य को चलाने के लिए दूरदर्शिता बहुत जरूरी है जिसका अभाव बिहार की राजनीति में हमेशा रही है। क्या कारण है इतने प्रतिभाओं को जन्म देने वाला राज्य राजनीतिक आपदा की दौर से गुजर रहा है।
इन सब से भी ज्यादा तेज केजरीवाल की तरह नई राजनीति को जन्म देने वाला प्रशांत किशोर है।
जिन नेताओं के पास मुद्दों का अभाव होता है वह धर्म और जाति की एकता की बात करके अपना चुनावी अभियान सुरु करते हैं। ये वही राजनीति है जो आजतक चलती आ रही है और एक नए प्रकार का तुष्टिकरण को ही जन्म देगा।

वक्त आ गया है जब कुछ नेता मनुस्मृति के बारे में बिना जाने गलत बोलते हैं उन्हें मनुस्मृति का पाठ पढ़ाया जाए।
विकास के नाम पर सीमित संसाधन सुविधाओं और धन को अलग अलग बांट देना ही इनका मकसद रहा है ना कि विस्तार करना । लाखों हत्या की पीड़ा झेल चुका है बिहार भूराबाल साफ करो की राजनीति दुनिया को पता है जी हां वह दौर था जब विकास के नाम पर जातिवाद को बढ़ाया गया पर आज का युवा जातिवादी जंजीरों से आजाद है उसे अपने भविष्य की चिंता है ,रोजगार की चिंता है।
चुनाव आने वाला है फिर से जातिवाद सर चढ़ कर बोलने वाला है फिर से वही पुराने नारे गूंजने वाले हैं सभी दल एक खोखले विचारों को परोसने वाले हैं ,क्या फर्क पड़ता है चुनावी समीकरण का खेल है सब पर प्रदेश की जनता क्या विकल्प देगी यह भविष्य के गर्त में ही छुपा हुए है।
औद्योगिक विकास की बात तो बहुत दूर है पहले अपने सोच का विकास करे राजनीतिक दल। जनता को भी अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि से सवाल पूछने होंगे उनको उनके द्वारा किए गए वादों का हिसाब मांगना होगा। हमें अपने घर में बैठे विधायक के कार्य श्रेणी पर वोट देना होगा ना की 1600 किलोमीटर दूर बैठे संसद भवन में बैठे नेताओं से, प्रधानमंत्री से।
प्रदेश को बदलने की बात करने वाले लोग पहले खुद में बदलाव लाएं तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
मैं प्रेरणा दे सकता हूं दिशा दे सकता हूं पर जमीनी स्तर पर जो जुड़े हुए हैं उनका कर्तव्य है अपने राज्य की रक्षा और उद्धार के लिए एक ऐसे आंदोलन की पृष्भूमि तैयार करें जो अहिंसक हो पर समाज को सोचने पर विवश करे पर क्या आज के युवा सकारात्मक ऊर्जा को अपनी शक्ति समझ कर आगे बढ़ने का दृढ़ संकल्प करेंगे या नहीं यह आने वाला वक्त ही बताएगा ।
धन्यवाद।
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