अफ़ग़ानिस्तान से भागते हुए सभी पुरुष दिख रहे हैं जो अपनी स्त्रियों और बच्चियों को तालिबानी लड़ाकों के लिए छोड़ कर भाग रहे हैं। अपनी छोटी छोटी बच्चियों को उन दरिंदों को सौंप कर अपनी जान बचा कर भाग रहे हैं । सोच कर कलेजा मुँह को आ जाता है, कि कैसे एक छोटी सी बच्ची को गोदी में उठाकर एक अफगान मां ब्रिटिश-अमरीकी सैनिकों को सौंप देती है क्योंकि उसे डर है कि अगर यह बच्ची तालिबान को मिल गई तो वह उसे दासी बना लेंगे। दूसरी तरफ हमारा इतिहास उठा लीजिए , हमारे सिर कट गए हैं लेकिन हमने अपनी स्त्रियों की मर्यादा की रक्षा के लिए महाभारत कर दिया था और समुद्र तक पर पुल बाँध दिया था।

लाखों हिंदुओं ने सिर्फ अपनी ही नहीं , हर वर्ग की स्त्रियों की रक्षा के लिए धड़ाधड़ शीश काट दिए या तो कटा लिए लेकिन अपनी स्त्रियों की रक्षा से कोई समझौता नहीं किया । यह है हमारी संस्कृति और हमारे शास्त्र जिनमें स्त्रियों के बिना किसी पुरुष का अस्तित्व या समाज का अस्तित्व असंभव है । अलाउद्दीन खिलजी ने सिर्फ रानी पद्मावती को पाने की चाहत रखी थी मगर राजा सुमेर सिंह ने अलाउद्दीन खिलजी के लाखों लश्कर से अकेले लड़ने का निर्णय लिया और आखिरकार रानी पद्मावती ने खुद को जोहर कर लिया।


हजारों अनगिनत उदाहरण हमारे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत में मौजूद है जहां सनातन धर्म के लोगों ने आततायी समुदायों के खिलाफ तलवार उठायी न कि पीठ दिखाई,बल्कि जिस तरह से अफगानिस्तान के पुरुषों को पठान कहकर बम्बई के उर्दुवुड ने खूब प्रोपेगैंडा फैलाया उसकी असलियत अब सामने आ रही है। 

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