अणूरेणिया थोकडा तुका आकाशाएवढा ।।१।। अर्थात् कभी अणु की तरह सूक्ष्म संत तुकाराम गगन की तरह असीम हो गये हैं।

इस पंक्ति में संत तुकाराम के सूक्ष्म रूप से समग्र, विस्तृत और व्यापक व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।

महाराष्ट्र में दो संप्रदाय हैं, वारकरी संप्रदाय और भागवत संप्रदाय, उनमें क्या अंतर है? ऐसा सवाल आम जनता पूछने लगती है। देखा जाये तो – कोई अंतर नहीं है। वारकरी संप्रदाय श्री विष्णु को केंद्र में मानता है। जबकि भागवत संप्रदाय श्रीकृष्ण को मानता है। मनुष्य द्वारा संप्रदाय जाति और धर्म की व्यवस्था बनायी गयी। भक्ति, आस्था, विश्वास में तो कोई अंतर नहीं है। संत बाहिनाबाई ने इस संत संप्रदाय का वर्णन किया है, जो एक बहुत ही प्रासंगिक अभंग में भक्ति की इमारत है।

ज्ञानदेवे रचिला पाया उभारिले देवालया ।।

नामा तयाचा किंकर त्याने केला हा विस्तार ।।

जनार्दन एकनाथ खांब दिला भागवत ।।

तुका झालासे कळस भजन करा सावकाश ।।


भक्ती की इमारत है, जिसकी नींव संत ज्ञानदेव ने रखी है। संत नामदेव एकनाथ जनार्दन ने मिलकर ये इमारत बनाई है। जिसका मुकुट है संत तुकाराम।

हर मानव अपना जीवन आनंद में बिताना चाहता है। लेकिन हर किसी को मनचाहा जीवन नही मिलता और आम लोगों को यह भी समझ नहीं आता कि ये सभी खुशियाँ क्षणभंगुर हैं। गीता का उपदेश यह है कि हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिये।

संतों ने इसी तत्त्वज्ञान को सरल भाषा में कहने का प्रयास किया …यह ज्ञान बांटने के लिए ही इस दुनिया में जन्म लिया है। यादवों के पतन के पहले और बाद के कुछ वर्षों तक, विदेशियों के हमलों से पीड़ित-शोषित जनता त्रस्त थी। इन लोगों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। भेदभाव की प्रणाली दुखद थी। संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों को इन मतभेदों का खामियाजा भुगतना पड़ा, लेकिन ज्ञानेश्वर जैसे योगी का जन्म ऐसे पाखंडियों पर कटाक्ष करने के लिए हुआ था। सोलह वर्ष की आयु में, उन्होंने भगवद् गीता के जटिल सार को आम जनता तक पहुँचाने का कार्यभार लिया। यहीं पर इस भक्ति भवन की नींव रखी गई और इस भवन की परिणति संत तुकाराम है।

जो लोग इस भक्ति संप्रदाय के भवन का हिस्सा बन गए हैं, वे सभी योगी पुरुष हैं। यदि हम संत तुकाराम की जीवनी को देखें, तो हम धीरे-धीरे इस योगी की मानवता का अनुभव कर सकते हैं, और साथ ही साथ मनुष्य की अलौकिक प्रकृति का भी अनुभव कर सकते हैं।

संत साहित्य के शोध और अनुसंधानों के अनुसार, संत तुकाराम बहुत ही सौम्य, मृदुभाषी थे और इसके विपरीत उनकी पत्नी ‘आवली’ का व्यवहार था। उनका जन्म एक धनी परिवार में हुआ था। उनका एक समृद्ध परिवार था, जिसमें विठ्ठल के प्रति समर्पण पारंपरिक रूप से था। लेकिन कुछ समय बाद, उन्हें विभिन्न आपदाओं का सामना करना पड़ा। सत्रह या अठारह साल की उम्र में, माता-पिता का निधन हो गया।

उनका बड़ा भाई बोरियत के कारण तीर्थयात्रा पर गया था। उन्हें भीषण अकाल का सामना करना पड़ा । इस अकाल में, उनके खेत, मवेशी और बाकी सब चले गए। लोगों के पास खाने-पीने का कोई सामान नहीं था। ऐसे समय में संत तुकाराम ने अपनी कमाई लोगों में बांटी । उन्हें गरीबों के प्रति बहुत सहानुभूति थी। संकट की स्थिति में कर्जदारों का कर्ज माफ किया। उनके पुत्र संतू की भी अकाल के दौरान मृत्यु हो गई। उन्होंने जीवन की अल्पता का अनुभव किया और फिर अनंत काल की खोज शुरू हुई।

सदा माझे डोळा

जडो तुझी मूर्ति

रखुमाईच्या पती सोयऱीया

गोड तुझे रूप गोड तुझे नाम

देई मज प्रेम सर्वकाळ

तुका म्हणे काही न मागो आणिक तुझे  पायी सुख पूर्ण आहे ।।

हे ईश्वर तुम्हारी मूर्त सदा मेरे मन में रहे, तुम्हारा नाम मेरे होठों पर रहे है उसी में सारा सुख है।

उन्हें भान हुआ कि सब कुछ भगवान की भक्ति में है। लेकिन आम लोग सुख और दुःख से अभिभूत थे। विदेशियों का आक्रमण जारी रहा। गुलामी में समाज खो गया था। अपने ही लोग आपस में झगड़ रहे थे। रूढ़िवादी लोगों ने चतुर्वर्ण व्यवस्था को मजबूत किया। पाखंडी और अंधविश्वासी लोगों ने समाज पर नियंत्रण कर लिया था। कुछ धार्मिक लोगों ने वेदों में ज्ञान का एकाधिकार कर लिया था। बहुजन समाज सो रहा था … सरल भोले लोग अनुष्ठान से भर रहे थे। समाज की इस अनदेखी का फायदा उठाया जा रहा था। संत तुकाराम ने इस बहुजन समाज को जागृत करके उनकी भ्रान्तियों को नष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने अभंग के माध्यम से जनता को उपदेश दिया।

सांडिली त्रिपुटी।

दीप उजळला घटी।।


अर्थात् मेरे सारे दोष नष्ट हो गये है इसीलिए अंतरदीप उजागर हुआ है।

प्रभु के चिंतन में उन्हें भव्य साक्षात्कार हुआ था। अज्ञान का अंधकार दूर हो गया था। इस लोककवि का उद्देश्य आम लोगों को समान ज्ञान देना था। लोगों को दुनिया में समानता, भक्ति, आध्यात्मिकता और मानवता के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए, उन्होंने संस्कृत वेदों के अर्थ को समझाने की कोशिश की। उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। बेहद सरल भाषा में उनके अभंग ने आज भी लोगों पर अपनी छाप छोड़ी है।

नाही निर्मळ जीवन

काय करील साबण ।।


अर्थात् जीवन अगर शुद्ध नहीं है तो साबुन लगाने से क्या फायदा?

उनका लेखन मनुष्य के जीवन, व्यवहार, स्वभाव, सच्चाई और झूठ पर सीधा हमला है। पर्यावरण जागरूकता का संदेश जो हमें आज दिया जाता है, वही संदेश है जो उन्होंने पांच सौ साल पहले अपनी बहुत ही सुंदर अभंगवाणी के माध्यम से दिया था।

वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी ।

वनचरी पक्षीही सुस्वरे आळविती ।।

सूखे रुचे एकांताचा वास नाही गुणदोष आपणासी ।।


अर्थात् ये सृष्टि ये चमन मेरे रिश्तेदार है मेरे अपने हैं, सारे पंछी भी यही बातें करते हैं, मनुष्य अगर स्वयं से बाते करें तो वह सारे संसार को जान सकता है।

मनुष्य को स्वयं से संवाद करना चाहिए। उसे दूसरों की योग्यता और अवगुणों को देखे बिना अपनी आत्मा को जानना चाहिए। यदि उसने ऐसा किया, तो उसे वास्तविक शांति मिलेगी। कुछ पाखंडी, इस बात से सहमत नहीं थे। वह तुकाराम के अवतार कार्य के बारे में जानते नहीं थे। उन्हें उत्तर देते हुए तुकाराम महाराज कहते हैं –

करतो कवित्व म्हणाल हे कोणी नव्हे माझी वाणी पदरीची 

माझी या युक्तीचा नव्हे हा प्रकार मज विश्वंभर बोलवितो ।।

बोलविता धनी वेगळाचि ।।


अर्थात् मेरी वाणी, मेरे वचन परमेश्वर की देन है। ईश्वर मेरी वाणी में बसा है वही मुझे बोलने की प्रेरणा देता है।

स्वयं को प्रखरपंडित कहने वाले लोगों ने उसे इंद्रायणी में अपने अभंग को डूबाने का प्रायश्चित करने के लिए कहा। लेकिन यह नहीं हो पाया। क्योंकि आम मनुष्य ने उनकी वाणी को अपनी वाणी बनाया था। हर शब्द जनता के मन में समाया था। मन की जड़ तक पहुँच गया था। वो कैसे मिटेगा? इसलिए, यह कहा जा सकता है कि ये अभंग इंद्रायणी में नहीं डूबे। वे तो जनता की आत्मा में बस चुके थे। सचमुच, संत तुकाराम का हर अभंग शानदार हीरा है। इस बात का अहसास बाद में सभी को हुआ।

जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने तुकाराम महाराज की लोकप्रियता के बारे में सुना और उन्हें सोने-मोती का उपहार दिया, तो तुकाराम ने उनसे कहा कि सोना हमारे लिए मिट्टी की तरह है। शिवाजी महाराज संत तुकाराम के व्यक्तित्व से प्रभावित हुये। उन्होंने स्वराज्य और साम्राज्य छोड़ने एवं तुकाराम के मार्ग पर चलने की चाह व्यक्त की। उस समय, संत तुकाराम ने उन्हें स्वयं अवतार कार्य के बारे में अवगत कराया।

यदि हम तुकाराम महाराज के समग्र चरित्र का अध्ययन करते हैं, तो हम देख सकते हैं कि उनके जैसे असाधारण लोगों को वास्तव में बहुत आपदाओं का सामना करना पड़ा है।

ऐरावत रत्न थोर

त्यासी अंकुशाचा मार

जया अंगी मोठेपण

तया यातना कठीण ।।


अर्थात् बडप्पन कोई आसान बात नहीं, उसके लिए पहले बडी मुश्किलें सहनी पड़ती है। इस कहावत के अनुसार, मनुष्य के रूप में भगवान जन्म लेते है, पर उन्हें मनुष्य जन्म में बड़े कष्ट उठाने पड़ते हैं। यहां तक ​​कि भगवान कृष्ण भी इससे बच नहीं पाए हैं।

एक और बात यह है कि किसी भी अलौकिक व्यक्ति की महानता आम लोगों को चमत्कार के बिना समझ में नही आती, यही कारण है कि उनका जीवन चमत्कारों से भरा हुआ लगता है।

संत तुकाराम महाराज की गाथाएँ इंद्रायणी नदी में नहीं डूबी थीं; वह तैर गयी … या वैकुंठ चली गई। संत तुकाराम का जो चमत्कार हुआ वह सभी को ज्ञात है। संत तुकाराम आखिरकार गायब हो गए । उनके शरीर को किसी ने नहीं देखा या उनके शरीर का अंतिम संस्कार किसी सामान्य व्यक्ति की तरह नहीं किया गया। संत तुकाराम को लेने के लिए स्वर्ग से एक पुष्पक विमान आया। भगवान उसमें बैठे थे; जो सभी धरतीवासियों को दिखाई दिए। विद्वानों के अनुसार, इस किंवदंती को लेकर कई विवाद हैं। इसका अर्थ यह है कि संत तुकाराम ने ऐसा महान कार्य किया है कि उन्हीं के कारण आम मनुष्य को ईश्वर के दर्शन हो पाये।

वास्तव में, संत तुकाराम का जन्म सत्रहवीं शताब्दी में हुआ था। लेकिन आज पाँच सौ साल बाद भी, उनके अभंग लोगों के मन में अभी जिंदा हैं। उनकी शिक्षाएँ हमें अपनी दिव्यता की तलाश करने के लिए प्रेरित करती हैं।

तुका म्हणे आता  । उरलो उपकारपुरता ।। ४ ।।


अर्थात् सचमुच इन संतो के एहसान हैं समस्त मानव जाति पर।

इन संतों द्वारा दिए गए सीख के कारण समाज अभी तक रसातल में नहीं गया है, और यदि यह विचार अगली पीढ़ी को दिया जाता है, तो समाज का निश्चित रूप से पुनर्निर्माण हो जाएगा। और संत तुकाराम के इस अभंग के सन्देश महत्वपूर्ण है –

हेचि दान देगा देवा तुझा विसर न व्हावा ।।

गुण गाईन आवडी हेचि माझी सर्व गोडी ।।

न लगे मुक्ती धनसंपदा संत संग देई सदा ।।

तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हासी ।।


अर्थात् हे ईश्वर मैं तुम्हें कभी ना भूलूं। तुम्हारी गुणगान सदा गाते रहूं। भले ही मुझे धन ना मिले। मुझे सदा सत्संगति मिले ।।

पर्यावरण का संदेश…समरसता की बात…भक्ति का मतलब क्या? व्यवहार में भक्ति का स्वरूप कैसा हो? सही दृष्टि से ज्ञान क्या है?

सामाजिक सभ्यता और सेवा भावना से ही मानव उन्नत होता है। वैश्विकता दैनंदिन आचरण में हो तो ही अपनाई जाएगी। भारत की जीवन दृष्टि निसर्ग से जुड़ी हुई है, वैज्ञानिक है और सहज स्वाभाविक है। भावनाओं का महत्व जानकर उसे नियंत्रित करने का और संस्कारों का महत्व मानकर ,ईश्वर का चिंतन-मनन करना जरूरी है। तुकाराम जगत गुरू है।

समूचे विश्व के मानव को, मानवता की आवश्यक बातें पांच सौ साल पहले कहने की क्षमता और निश्चयी विचार व आचरण का दर्शन यही उनकी गाथा है।

भाव समझा तो ही ईश्वर समझ आएगा। आज की स्थिति में, ग्लोबलाइजेशन की सोच में भी जरूरी ज्ञान ससे मिलता है। यही नकी श्रेष्ठता है। संत तुकाराम सुक्ष्मातिसुक्ष्म और वैश्विक व्यक्तित्व है।

सवाल पूछने की क्षमता, न्यून समझाने की दूरदर्शिता, वक्रता और सार्वत्रिक, सामाजिक और सामुहिकता के लिए जो बातें, सोच व अडंग लगाने वाली हो सकती है, से स्पष्टता से कहने की हिम्मत रखने वाले क्रांतिकारी संत थे तुकाराम!

विज्ञान, ज्ञान की जड़ता, मूल सोच में ही मानवता, बंधूता, धार्मिकता’ का अविष्कार है यह समझाने की कुशलता, नमें थी।

तु, का राम ? तुका, राम !! तुकाराम !! इस नाम में ही क्रांति है।

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