स्वाध्याय अवश्य करें

स्वाध्याय पर बात करते हैं।
यदि आपको धर्म, अध्यात्म और हिन्दू धर्म से सम्बंधित जिज्ञासाएं हैं और कोई युक्ति युक्त समाधान नहीं सूझ रहा है तो निम्न प्रयास करें, निश्चय ही प्रायः सभी शंकाएं सिमट जाएंगी।
1.जो भक्त नहीं है, अर्थात उपासना की कोई अन्य विधि, योगी अथवा नास्तिक भी हैं लेकिन हिंदुत्व और देश के लिए कुछ करना चाहते हैं, और केवल तर्क के बल पर जानना चाहते हैं या प्रतिपक्षियों का मुँह बन्द करना चाहते हैं उन्हें महर्षि दयानंद सरस्वती विरचित #सत्यार्थ_प्रकाश पढ़नी चाहिए। किसी भी पुस्तक विक्रेता और निकटवर्ती आर्य समाज केंद्र पर उपलब्ध है। आप इसे तर्क का प्रवेशद्वार भी मान सकते हैं क्योंकि इस अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ का जैसा उपयोग हमें करना चाहिए था वैसा हुआ नहीं और कई सनातनियों ने श्रद्धाभंग के भय से इसका बिल्कुल ही तिरस्कार कर दिया।
2.यदि आप सत्यार्थ प्रकाश पढ़ चुके हैं और उससे भी आगे की बात जानना चाहते हैं तो आपको गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित विशाल ग्रन्थ, जिसका नाम है #क्यों? पढ़ना चाहिए।
इसके लेखक शास्त्रार्थ महारथी माधवानंद शास्त्री हैं। इन्होंने ही उडुपी धर्मसभा में “हिंदवः सोदरा: सर्वे, न हिन्दू पतितो भवेत। मम दीक्षा हिन्दुरक्षा मम मन्त्रः समानता।।” श्लोक की रचना की थी।
वस्तुतः बात यह थी कि सत्यार्थ प्रकाश के प्रबल तर्कों के सामने सनातन धर्म के अन्य सम्प्रदाय बहुत फीके पड़ रहे थे और आर्यसमाज के ही कई व्यक्तियों और तर्कों का उपयोग हमारे शत्रु भी करने लग गए थे, ऐसे समय में एक प्रबल तार्किक ग्रन्थ की आवश्यकता थी जो हिन्दू परम्पराओं, सिद्धांतों और विविध पन्थों को सुरक्षित रख सके।
तब ‘भाईजी’ के आग्रह पर माधवानंद जी ने यह विशाल ग्रंथ लिखा। यह दो खण्डों में उपलब्ध है।
वर्तमान में हिन्दू धर्म के पक्ष में विभिन्न तार्किक पोस्ट और युक्तियां इसी ग्रन्थ की देन है।
जैसे “भगवा रंग क्यों पवित्र है?”
स्त्रियां सिंदूर क्यों लगाती हैं?
विवाह में अग्नि के फेरे क्यों लगाए जाते हैं?
शव को जलाना ही क्यों चाहिए?
मूर्ति पूजा क्यों करते हैं?
मंदिर क्यों जाते हैं?
ऐसे हजारों “क्यों” के समाधान इस ग्रंथ में बहुत ही सरल, रोचक, तार्किक विधि से दिए गए हैं।
इसीलिए तो उन्हें #शास्त्रार्थ_महारथी कहा जाता था। उनके सम्मुख कोई तार्किक नहीं ठहर पाता था।
यह तो आप जानते ही हैं कि गीताप्रेस का साहित्य बहुत सस्ता होता है।
अतः दोनों ही खण्ड मंगवाकर पढ़ने, पढ़वाने चाहिए।
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