साल 1992 , अजमेर बलात्कार कांड जिसे शायद भारत का सबसे बड़ा सेक्स कांड कह सकते हैं . जहां रसूखदार दोस्तों के ग्रुप ने पहले तो स्कूल की कुछ लडकियों को धोखे से अपने चंगुल में फंसाया और फिर उनका बलात्कार किया | उसके बाद वो उन्हीं लडकियों की दोस्तों को बुलाते और जबरन उनके साथ गलत  कर उनकी अश्लील तस्वीरें खींच लेते | जब उन्हें समाज और परिवार का साथ नहीं मिला तो उनमें से 6 पीड़ित लड़कियों ने आत्महत्या कर ली. 1992 के राजस्थान का कुख्यात सामूहिक बलात्कार कांड आज भी एक खुले घाव के समान है, जिसे उस घटना की पीड़िताएं पिछले 30 सालों से झेल रही हैं।

इस कांड ने अजमेर शहर पर एक ऐसा बदनुमा दाग लगा दिया जिसे धोना आसान नहीं हैं. इस मामले में कुल 8 लोगों के खिलाफ शुरुआत में मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद जांच हुई और 18 आरोपी निकले। इस मामले को उठाने वाली स्वयंसेवी संस्था धमकियों से डरकर भाग खड़ी हुई थी . इन भूखे भेड़ियों का तरीका भी बहुत आसान था। पहले एक बलात्कार किया और उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें खींची। फिर उस तस्वीर से पीड़िता को ब्लैकमेल किया और उसे अपनी किसी मित्र को अपराधियों के अड्डे तक लाने के लिए कहा। फिर दूसरा, फिर तीसरा शिकार इस तरह सौ से ऊपर लड़कियों के साथ महीनों ऐसा होता रहा। अपराधी स्थानीय कांग्रेसी नेता जी थे, और फिर उन्हें रोज़ ऐसा करते देख के उनके गुर्गे, चेले-चमचे इन लड़कियों के शोषण में शामिल हुए, यहां तक कि उनके ड्राईवरों ने भी लड़कियों के साथ बलात्कार किया।

ये वही लोग थे, जिन पर सूफी फ़क़ीर कहे जाने वाले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह की देखरेख की जिम्मेदारी थी। ये वही लोग थे, जो ख़ुद को चिश्ती का वंशज मानते हैं। उन पर हाथ डालने से पहले प्रशासन को भी सौ बार सोचना पड़ता। अंदरखाने में बैठे बाबू इस बात से वाकिफ थे वाबजूद इसके उन लोगों ने इस पर पर्दा डाले रखा.

यह कई युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार, वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरों के साथ सबमिशन और चुप्पी में ब्लैकमेल करने का मामला था। जिसमें आरोपी सियासी छतरी के नीचे पूरी तरह से सुरक्षित थे .लेकिन गनीमत है कि शहर के क्राइम रिपोर्टरों ने अपनी जान पर खेल कर इस मामले को सामने लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी , दरअसल वो दौर सोशल मीडिया का नहीं पेड मीडिया का था, ये वो ख़बरें थी जिन्हें कांग्रेसी हुक्मरानों ने नोट और तुष्टीकरण की राजनीती के लिए दबा दिया था।  इस कुख्यात मामलें में विडम्बना यह थी कि अजमेर में हर कोई जानता था कि आरोपी कौन हैं। उस समय अजमेर के मशहूर चिश्ती भाई, जिसका नाम फारूक चिश्ती और नफीस चिश्ती था, वह खुलेआम घूम रहे थे। यह दोनों भाई अजमेर शरीफ दरगाह के संरक्षक परिवार और उनके दोस्तों के गिरोह से संबंधित थे। इन लोगों ने स्कूल जाने वाली कई युवतियों को महीनों तक धमकियों और ब्लैकमेल के जाल में फंसाया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। उसके बाद भी उनका मन नहीं भरा तो एक फोटो कलर लैब ने महिलाओं की नग्न तस्वीरें छापी और उन्हें प्रसारित करने में मदद की।

धीर-धीरे मामला बढ़ता देख अजमेर में धार्मिक तनाव बढ़ गया और शहर को बंद करना पड़ गया, यह घटना पूरी तरह से कानूनी लचरपन और पुलिसिया कमजोरी की जीती जागती मिसाल है। उस समय की स्कूली छात्राएं, सामूहिक बलात्कार पीड़िताएं अपने साथियों और बच्चों और पोते-पोतियों के साथ अलग-अलग शहरों में चली गई.

दरअसल इस मामले में पीड़ितों की संख्या कई सौ मानी जाती थी, लेकिन कुछ ही पीड़ित हिम्मत जुटाकर सामने आई। हालात इतने खराब थे कि जिन लड़कों की शादी अजमेर की लड़कियों से होने वाली थी वो समाचार पत्रों के ऑफिस जाकर ये पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि जिस लड़की से वे शादी करने जा रहे हैं, कहीं उनमें से कोई लड़की इस कांड में शामिल तो नहीं ।

दिलचस्प बात यह है कि मुख्य आरोपियों में से एक फारूक चिश्ती, कांग्रेस का नेता भी था, उसको बाद में मानसिक रूप से बीमार बता दिया गया। फारूक चिश्ती अजमेर युवा कांग्रेस का अध्यक्ष था, जबकि दो अन्य आरोपी नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती शहर कांग्रेस इकाई के उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव थे, जिसके कारण वो सालों तक बचते रहे और साथ ही कांग्रेस की सरकार होने पर इनको संरक्षण भी मिला हुआ था ।

साल 1998 में, अजमेर की एक सत्र अदालत ने आठ लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, लेकिन साल 2001 में राजस्थान हाई कोर्ट ने उनमें से चार को बरी कर दिया। बाकी चार की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने साल 2003 में घटाकर सिर्फ 10 साल कर दिया था। वहीं, फरार सलीम चिश्ती को साल 2012 में राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किया था। एक अन्य मुख्य आरोपी आलमास महाराज अभी भी फरार है और माना जाता है कि वह अमेरिका में है। सीबीआई ने उनके लिए रेड कॉर्नर अलर्ट जारी किया है।

दरअसल जब मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत की सरकार ने जांच के आदेश तो दिए तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। कहा जाता है कि कांग्रेस नेता जयपाल का भी इस सेक्स स्कैंडल में हाथ था और पत्रकार मदन सिंह की हत्या भी इसी कारण हुई। मदन सिंह इस पूरी घटना का पर्दाफाश करने में लगे हुए थे। लेकिन पुलिस ने इस हत्याकांड को गैंगवार का नतीजा करार दिया था।

उस वक़्त अजमेर में 350 से भी अधिक पत्र-पत्रिका थी और इस सेक्स स्कैंडल के पीड़ितों का साथ देने के बजाए स्थानीय स्तर के कई मीडियाकर्मी उल्टा उनके परिवारों को ब्लैकमेल किया करते थे। इस पूरे मामले में समाज का कोई भी ऐसा प्रोफेशन शायद ही रहा हो, जिसने एकमत से इन पीड़िताओं के लिए आवाज़ उठाई हो। यहां तक कि जिस लैब में फोटो निकाले गए, जिन पत्रकारों को इसके बारे में पता था उन सबने मिल कर अलग-अलग ब्लैकमेलिंग का धंधा चमकाया। पीड़ित लड़कियों और उनके परिवारों से सबने पैसे ऐंठे। ऐसे में भला कोई न्याय की उम्मीद करे भी तो कैसे?  वैसे भी अंधे और बहरे सिस्टम से उम्मीद भी क्या की जा सकती है .

अजमेर कांड की यह कहानी आज भी शरीर में सिहरन पैदा कर देती है। स्कूल जाने वाली बच्चियों को किस खौफ और मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा, उसे किसी ने महसूस नहीं किया। सत्ता में बैठी कांग्रेस और उसके नेताओं ने किस तरह से कानून के साथ खिलवाड़ किया, कैसे कई परिवारों को बर्बाद किया ये किसी से छिपा नही है, वो लोग भले भूल जाए, लेकिन इतिहास कभी नहीं भुला सकता है! उन सैकड़ों हिन्दू लड़कियों के साथ जो हुआ, वह अमानवीय नहीं दैत्यीय अपराध था।

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