माँ दुर्गा का अपमान करने वालों को “मकसूद” का हश्र याद रखना चाहिए

शक्ति की देवी माँ दुर्गा की नौ दिनों तक की जाने वाली पूजा उपासना आराधना में कन्या को देवी के रूप में देखने मानने पूजने की परम्परा रही है किन्तु ये बहुत ही दुखद और चिंताजनक बात है कि नवरात्रि के नौ दिन भी हिन्दू समाज को और यहां तक कि देवी देवताओं तक को निशाने पर लिया जाता है , कहीं पंडाल जलाया जा रहा है तो कहीं मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं , तो रोज़ कहीं न कहीं कोई भी मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति यूँ इस तरह से हमारे आराध्यों के प्रति इतनी घिनौनी बात कह रहा है।
शब्दों से अंदर का मैल बाहर उड़ेल कर सब कुछ दूषित करने वाले ये लम्पट इस तरह कुछ भी लिख कर भाग खड़े होते हैं। अब न तो कोई प्रोफ़ाइल दिख रही है और न ही उस पर बिखरा हुआ दूषित विचार। ये शब्द बहादुर बस इतने ही हिम्मत वाले होते हैं ठीक उस दीवाने की तरह जो दूर से गली में छिप कर पत्थर मार कर भाग खड़े होते हैं। लेकिन बार बार ये सब होना कहीं न कहीं ये भी दर्शाता है कि ऐसा करने वालों के मन में कम से कम कानून और पुलिस का कोई भय नहीं है।
लेकिन इन धर्म द्रोहियों को जिन्होंने देवी देवताओं के बारे में अपशब्द लिख कर अपने जीवन का सबसे अक्षम्य पाप किया है इन्हें शायद आज से बरसों पहले का मकसूद याद नहीं है। मकसूद वो था जो आज से कुछ साल पहले दिल्ली की चिडियाघर में विजय नामक बाघ द्वारा मारा गया था। वो उस सफ़ेद बाघ के बाड़े में कैसे गिरा /कूदा ये कोई नहीं जानता। परिवार वालों के मुताबिक़ उसकी मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे नहीं कह सकते कि वो गिरा या खुद कूद गया। बाद में न्यायालय ने मकसूद के परिवार को छः लाख का मुआवजा दिए जाने का आदेश दिया।
लेकिन जो बात बाद की खबरों में निकल कर सामने आई वो ये थी कि मकसूद की मानसिक हालत उसके ठीक कुछ दिनों बाद खराब होने लगी थी जब उसने अपने साथियों के साथ पड़ोस में चल रहे देवी माँ के जागरण को हंगामा और मारपीट करने के बाद बंद करवा दिया था। संयोग से माँ दुर्गा के वाहन के रूप में शेर /बाघ के होने के कारण लोगों ने यही कहा कि -दंड पाने के लिए मक़सूद खुद मौत के सामने कूद गया।
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