अंग्रेजों के वर्चस्व, (हुकूमत) के समय भारत भूमि के उद्धार के लिए दिन-रात चिंता करने वाले एवं तन, मन, धन उद्धार कार्य के लिए अर्पित करने वाले कुछ मानवरत्न हुए हैं । उनमें से एक दैदिप्यमान रत्न अर्थात “बाल गंगाधर तिलक ” । “स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और वह मैं लूंगा ही” ऐसी गर्जना करने वाले इस भारतीय नरसिंह ने अपनी युवा अवस्था स्वार्थ त्याग कर राष्ट्र के लिए समर्पित करके देश में नव जागृति निर्माण की । लोकमान्य उपाधि प्राप्त ध्येयवादी व्यक्तित्व की 1 अगस्त के दिन पुण्यतिथि मनाई जाती है । इस अवसर पर मजबूत एवं  जाज्वल्य नेतृत्व का संक्षेप में परिचय प्राप्त करते हैं । उनके जीवन चरित्र से हमें हमेशा ही ज्ञान एवं मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

समाचार पत्रों की आवश्यकता समझ कर केसरी एवं मराठा सप्ताहिक पत्र प्रारंभ करना : शालाओं में केवल विद्यार्थियों को ही शिक्षा दी जाती थी । परंतु अब प्रत्येक भारतीय को उसकी परतंत्रता का स्वरूप समझाना था । लोगों को संगठित करके वर्तमान स्थिति का ज्ञान एवं कर्तव्य की भावना उनमें जागृत करनी थी । यह सब प्रभावी तरीके से करना हो, तो उसके लिए समाचार पत्रों की ही आवश्यकता है, ऐसा विचार उन्होंने किया । उन्होंने ‘केसरी एवं मराठा’ साप्ताहिक चालू किए । कुछ ही दिनों में यह साप्ताहिक पत्र लोकप्रिय हो गए । इसमें जनता के दुखों का सविस्तार विवेचन एवं वास्तविक घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख होता था । अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए भारतीयों को तैयार किया जा रहा था । उनकी भाषा में इतना सामर्थ्य था कि भीरू व्यक्ति में भी स्वतंत्रता की लालसा जागृत होती थी । केसरी ने अंग्रेजी सरकार की अनेक अन्याय कारी बातें प्रकाश में लाईं। इस कारण सरकार केसरी पत्र न्यायालय ले गए एवं इसके परिणाम स्वरूप तिलक एवं आगरकर को 4 माह का सश्रम कारावास का दंड मिला । ईसवी 1894 में गोखले व रानाडे ने स्वदेशी आंदोलन छेड़ा। तिलक जी ने अपने साप्ताहिक पत्रों द्वारा, लेखों के माध्यम से यह विचार घर-घर पहुंचाया।

गणेशोत्सव
 एवं शिवजन्मोत्सव के माध्यमों के द्वारा लोगों को संगठित करना : ईसवी 1890 से 1897 यह 7 वर्ष उनके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण रहे । तिलक अब धुरंधर राजनीतिज्ञ बन गए थे। सामाजिक सुधारों के लिए उन्होंने शासन के विरुद्ध लड़ाई चालू कर दी । बाल विवाह को प्रतिबंधित किया जाए एवं विधवा विवाह को सम्मति मिले इसलिए उन्होंने सब का आवाहन किया। गणेश उत्सव एवं शिवजन्मोत्सव इन माध्यमों के द्वारा लोगों को संगठित किया । इसी बीच उनका मुंबई विश्वविद्यालय के फेलो पद पर चुनाव हुआ इसी समय उन्होंने  ‘ओरायन ‘ नामक  ग्रंथ लिखा।

प्लेग की महामारी फैलने पर अस्पताल खोलना : ईस्वी 1896 में भारत में अकाल पड़ा। प्लेग की महामारी फैली। इसलिए तिलक जी ने अस्पताल खोले। स्वयंसेवकों की सहायता से रोगियों की सेवा सुश्रुषा होने लगी। संपादकीय लेखों के माध्यम से अकाल एवं महामारी में मृत लोगों के आंकड़े निर्भयता से प्रसिद्ध किए । शासन से सहायता मांगना अपना अधिकार है, और उस संबंध में योग्य कार्यवाही हो इसलिए जनता को सतर्क किया, किन्तु शासन रानी विक्टोरिया के राज्य रोहण की हीरक जयंती महोत्सव की तैयारियों में व्यस्त था। अंत में महामारी पर नियंत्रण के लिए रैंड नामक अधिकारी की नियुक्ति हुई। परंतु रैंड इस महामारी से भी अधिक भयानक निकला । भारतीय जनता पर अत्याचार करने में उसने कोई कमी नहीं की। उसके अत्याचारों के कारण एक युवक ने गोली मारकर उसकी हत्या की। इस हत्या के पीछे तिलक जी का हाथ होगा, इस  संदेह के कारण 1897 में उन्हें कारावास में डाला गया। राष्ट्र के लिए जीवन समर्पण एवं गीता रहस्य ग्रंथ के लेखन का महत्वपूर्ण  कार्य- स्वदेशी, स्वराज्य, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा ये पवित्र शब्द तिलक जी ने लोगों को सिखाए। लोगों ने इनका शस्त्रों के समान उपयोग किया। स्वदेश के लिए प्रेम एवं परतंत्रता के लिए असंतोष निर्माण करने की क्रांति तिलक जी ने की । इन सभी कार्यों  से अंग्रेजी शासन बहुत क्रोधित हुआ और उन्होंने तिलक जी पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें हथकड़ियां लगाईं। न्यायालय में 14 वर्षों तक तिलक जी लड़े । जनता का आवेश कम हो, इसलिए शासन ने अत्यंत कठोर एवं निर्दयी उपाय खोजे। इन के कारण तिलक जी का खून खौल उठा और “देश का दुर्भाग्य” इस शीर्षक से उन्होंने केसरी में लेख लिखा । उन्होंने लिखा देश में बम बनना यह देश का दुर्भाग्य है, परंतु वह बनाकर उसे फेंकना अर्थात विस्फोट की स्थिति निर्माण करने के लिए शासन ही उत्तरदायी है । उनके इस लेख के कारण शासन को यह पता चल गया कि जब तक तिलक जी आजाद हैं तब तक शासन को भय  है। इस लेख के संबंध में देशद्रोह का आरोप लगाकर 24 जून 1908  दिन मुंबई में उन्हें गिरफ्तार किया गया एवं 6 वर्ष की सजा दी गई। इस समय वे 52 वर्ष के थे। इसी समय उनको मधुमेह का रोग हुआ परंतु उन्होंने परवाह नहीं की। बर्मा के मंडाले के कारागृह में उन्हें रवाना किया गया। वहां तिलक जी को लकड़ी के फट्टों का छोटा सा कमरा दिया गया। सश्रम कारावास से सादा कारावास ऐसी उनकी सजा में कमी की गई। 

ग्रन्थ लेखन : उन्हें कारागृह में लेखन एवं वाचन की सुविधा मिली। यहीं उन्होंने ‘गीता रहस्य’ इस ग्रंथ के लेखन का महान कार्य किया। एकांत सुसह्य हो इसलिए वे हमेशा लेखन एवं पठन में व्यस्त रहते थे । 6 वर्षों का कारावास समाप्त होने तक उन्होंने 400 पुस्तकों का संग्रह किया। स्वयं शिक्षक मार्गदर्शिका का उपयोग करके उन्होंने जर्मन एवं फ्रेंच भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। समय की कमी के कारण जो कार्य वे पहले नहीं कर सकते थे, उस तरफ वे अब ध्यान देने लगे। सुबह प्रार्थना, गायत्री मंत्र एवं अन्य वैदिक मंत्रों का जप एवं अन्य धार्मिक कृत्य करने लगे। वे मंडाले के कारागृह में थे, उसी समय उनकी पत्नी सत्यभामा बाई की भारत में मृत्यु हो गई।

तिलक जी का जीवन दिव्य था। लोगों के सम्मान एवं श्रद्धा के लिए हर दृष्टि से योग्य थे । तन, मन एवं धन सर्वस्व अर्पण करके उन्होंने देश की सेवा की। शरीर थकने पर भी उन्होंने लोक जागृति के लिए निरंतर प्रवास व्याख्यान यह कार्यक्रम चालू रखे। जुलाई 1920 में उनकी प्रकृति और बिगड़ गई। 1 अगस्त को प्रथम प्रहर में उनका जीवनदीप बुझ गया। यह दुखद वार्ता हवा के समान सारे देश भर में फैल गई ।अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शनों के लिए जनता का महासागर उमड़ पड़ा। अपनी प्रत्येक  कृति से जीवन के अंतिम श्वास  तक देश के लिए लड़ते रहने वाले ध्येयवादी महान राष्ट्रभक्त को हमारा विनम्र अभिवादन।

श्री. रमेश शिंदे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, हिन्दू जनजागृति समिति

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