श्री गणेश चतुर्थी पर पूजन व शास्त्र !

श्री गणेश चतुर्थी के साथ-साथ श्री गणेशोत्सव के दिनों में, गणेश तत्व पृथ्वी पर सामान्य से 1000 गुना अधिक सक्रिय होता है। इस दौरान भगवान श्री गणेश की पूजा करने से गणेश तत्व का अधिक लाभ मिलता है। इस दिन “श्री गणेशाय नमः” का अधिक से अधिक नामजप करना चाहिए।
श्री गणेश चतुर्थी पर रखा जाने वाला व्रत: श्री गणेश चतुर्थी पर रखा जाने वाला व्रत सिद्धिविनायक व्रत के नाम से जाना जाता है। यह व्रत सभी परिवारों में किया जाता है। यदि सभी भाई एक साथ रहते हों अर्थात उनके द्रव्यकोश (खजाना) और चूल्हा एक साथ हों तो एक साथ पूजन करना चाहिए अन्यथा किसी कारणवश द्रव्यकोश और चूल्हा अलग-अलग हो जाएं तो उन्हें अपने-अपने घर में अलग-अलग गणेश प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए। जिन परिवारों में केवल एक ही गणपति स्थापित करने की परंपरा है, वहां जिस भाई के मन में भगवान के प्रति अधिक भक्ति हो, उसे अपने घर में गणपति बिठाना चाहिए।
शुद्ध चतुर्थी को मिट्टी से गणपति जी की प्रतिमा बनाई जाती है । शास्त्रोक्त प्रथा है कि इसे बायें हाथ पर रखना चाहिए तथा सिद्धिविनायक के नाम से प्राणप्रतिष्ठा एवं पूजन करने के पश्चात तुरंत विसर्जित कर देना चाहिए; परन्तु मनुष्य, उत्सवधर्मी होने के कारण, इस से संतुष्ट नहीं होता; इसलिए उन्होंने डेढ़, पांच, सात अथवा दस दिन तक श्री गणपति का उत्सव मनाना शुरू कर दिया। कई (बुजुर्ग) गणपति के साथ गौरी का विसर्जन कराते हैं। यदि किसी के कुलाचार में गणपति पांच दिन के हैं और वे इसे डेढ़ या सात दिन का करना चाहते हों तभी वे ऐसा कर सकते हैं । इसके लिए किसी आधिकारिक व्यक्ति से पूछना आवश्यक है। श्री गणेश विसर्जन हमेशा की तरह पहले, दूसरे, तीसरे, छठे, सातवें या दसवें दिन किया जाना चाहिए।
मध्य पूजा विधि: जब तक गणपति घर पर हैं, तब तक प्रतिदिन सुबह और शाम को आरती और मंत्र पुष्पांजलि कहकर उसी तरह से गणपति की पूजा करनी चाहिए जैसे हमेशा उनकी पूजा करते हैं। गणेश प्रतिमा की स्थापना के बाद रोजाना पंचोपचार पूजा करनी चाहिए।
उत्तर पूजा : यह पूजा गणपति के विसर्जन से पहले की जाती है। नीचे दिए गए विशिष्ट मंत्र के अनुसार पूजा करनी चाहिए – 1. आचमन, 2. संकल्प, 3. चन्दनार्पण, 4. अक्षतार्पण, 5. पुष्प अर्पण, 6. हरिद्रा (हल्दी)-केसर नैवेद्य, 7. दूर्वार्पण 8. धूप-दीप दर्शन एवं 9. प्रसाद इसके बाद आरती करनी चाहिए और मंत्र पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए। सभी को गणपति के हाथ पर अक्षत चढ़ाना चाहिए और मूर्ति को दाहिने हाथ से घुमाना चाहिए।
विसर्जन: उत्तरपूजा के बाद मूर्ति को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जन के लिए जाते समय गणपति के साथ दही, पोहा, नारियल, मोदक आदि शिदोरी चढ़ानी चाहिए। जलाशय के पास फिर से आरती करनी चाहिए और मूर्ति को शिदोरी के साथ पानी में छोड़ देना चाहिए।
संदर्भ : सनातन संस्था के ग्रंथ गणपति
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