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क्या चीन-पाक की भारत विरोधी नीति का रूस हिस्सा बनेगा

-बलबीर पुंज

 

भारत के संदर्भ में हालिया वैश्विक घटनाक्रम का निहितार्थ क्या है? चीन की राजधानी बीजिंग में 4 फरवरी को आयोजित शीत ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह का भारत ने बहिष्कार कर दिया और ऐसा वह इसके समापन कार्यक्रम में भी करेगा। भारत ने अपनी संप्रभुता, एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाते हुए यह उचित और स्वागतयोग्य निर्णय इसलिए लिया, क्योंकि चीन ने अपनी कुटिल मानसिकता का परिचय देते हुए 15-16 जून 2020 के खूनी गलवान प्रकरण में भारतीय सुरक्षाबलों के हाथों घायल हुए एक चीनी सैनिक को अपने देश के ओलंपिक दल का ध्वजावाहक बनाया था। भारत के इस फैसले का अमेरिका समर्थन कर रहा है।

 

चीन की ‘हेकड़ी’ से उसके पड़ोसी देशों सहित शेष दुनिया में छिपी नहीं है। स्वयं को एशिया का ‘गुंडा’ मानने वाला चीन, लद्दाख में हिमालयी पैंगोंग झील के पास सैन्य-संघर्ष में पिटे अपने जवान को ध्वजावाहक बनाने को संभवत: इसलिए भी बाध्य हुआ, क्योंकि इन खेलों के प्रारंभण से दो दिन पहले ऑस्ट्रेलियाई समाचारपत्र ‘द क्लैक्सन’ ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि भारतीय जवानों के साथ हुए टकराव में चार नहीं, अपितु 42 चीनी जवानों की मौत हुई थी। भारत पहले ही इस संघर्ष में अपने 20 सैनिकों के बलिदान की बात स्वीकार कर चुका था।

 

भारत से पहले अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जापान, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, स्वीडन, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, एस्टोनिया, कोसोवो, लातविया और लिथुआनिया आदि देशों ने आंशिक या पूरी तरह से चीन में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक के राजनयिक बहिष्कार की घोषणा की थी। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इन सभी लोकतांत्रिक देशों का कुल योग 35 प्रतिशत हैं, तो आबादी 200 करोड़ से अधिक है। यदि बात क्वाड समूह की जाए, तो इसके सदस्य देशों- भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के अतिरिक्त, आसियान देशों आदि के साथ अधिनायकवादी चीन के संबंध तनावपूर्ण चल रहे है। ऐसे में यह चीन को बड़ा संदेश है कि विश्व में उसकी आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक दादागिरी उसे महंगी पड़ सकती हैं।

 

शीत ओलंपिक खेलों के राजनयिक बहिष्कार हेतु अमेरिका के नेतृत्व में अधिकांश देशों ने मानवाधिकार के मामले में चीन के कलंकित रिकॉर्ड को मुख्य आधार बनाया है। चीन ने अपने शिनजियांग प्रांत में दस लाख से अधिक मुसलमानों को ‘यातना’ शिविरों में जबरन कैद करके रखा है, तो उनपर दाढ़ी बढ़ाने, कुरान पढ़ने, बुर्का पहनने, मदरसा जाने और इस्लामी नाम आदि रखने पर कड़ा प्रतिबंध है। तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र में भी बौद्ध भिक्षुओं और अन्य अनुयायियों का सांस्कृतिक संहार चरम पर है। यहां के कार्दजे क्षेत्र में एक बड़ी बुद्ध प्रतिमा को चीनी अधिकारियों ने दिसंबर 2021 में ध्वस्त कर दिया था। तब स्थानीय लोगों को इस बात के लिए बाध्य किया गया था कि वे प्रतिमा को टूटते हुए देखें। इसके बाद क्षेत्र में असंख्य बौद्ध धर्मावलंबी और भिक्षुओं से मारपीट भी की गई थी। यह कार्रवाई तिब्बत की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करने हेतु दशकों से जारी अभियान का हिस्सा है। यहां तिब्बतियों को माओ के शासनकाल से जबरन वामपंथी विचार परिवर्तन, घुसपैठ निगरानी, राजनीतिक पुन:शिक्षा, सैन्य-शैली के अधीन रखा गया है। इसी प्रकार चीन, बलपूर्वक हांगकांग और ताइवान में अपना आधिपत्य बढ़ाना चाहता है। चीन की कपटयुक्त अधिनायकवादी मानसिकता उसके द्वारा अपने पड़ोसी देशों (भारत सहित) के भूभागों पर अतिक्रमण, दक्षिण चीन सागर में अवैध क्षेत्रीय दावों और श्रीलंका सहित कई छोटे देशों को अपने विकृत कर्ज-मकड़जाल में फंसाने से भी स्पष्ट है।

 

कोविड-19 के कारण 91 सदस्य देशों के साथ हो रहे बीजिंग शीत ओलंपिक खेलों का जब भारत, अमेरिका सहित विश्व के कई लोकतांत्रिक राष्ट्रों ने राजनयिक बहिष्कार किया, तो चीन को इसमें पाकिस्तान सहित लगभग 20 देशों का साथ मिला। इनमें से अधिकांश देश गैर-लोकतांत्रिक, घोषित इस्लामी या फिर चीन की भांति अधिनायकवादी थे। बड़ी शक्ति के रूप में चीन को केवल भारत के निकटवर्ती सहयोगी रूस का साथ प्राप्त हुआ। यूक्रेन-रूस तनाव के बीच बीजिंग में चार फरवरी को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की चीनी समकक्ष शी जिनपिंग से भेंट भी हुई थी। तब अपने संयुक्त वक्तव्य में दोनों ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ ‘असीमित’ सहयोग पर बल दिया था। जहां चीन ने रूस की यूक्रेन संबंधित नाटो-नीति का समर्थन किया, तो जवाब में रूस ने ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करते हुए उसे चीन का प्रांत माना।

 

हालिया दशकों में चीन-रूस के बीच संबंध तब अधिक गहरे हो गए थे, जब फरवरी-मार्च 2014 में क्रीमिया प्रायद्वीप पर आक्रमण और उसपर कब्जा जमाने के कारण प्रतिबंध झेल रहे रूस की चीन ने आर्थिक-कूटनीतिक सहायता की थी। इन दोनों देशों की मैत्री यूक्रेन मामले पर 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के हालिया मतदान में भी देखने को मिली, जहां अमेरिका सहित 10 देशों ने इसके पक्ष और रूस और चीन ने इसके खिलाफ मत दिया। यहां भारत (अन्य दो देशों के साथ) ने मतदान से परहेज किया था। इसपर अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा था कि भारत के साथ अमेरिका का संबंध अपनी खूबियों पर है, वह रूस के साथ तनाव से प्रभावित नहीं।

 

सच तो यह है कि चीन का रूस के साथ नजदीकियां बढ़ाने का एक बहुत बड़ा कारण अमेरिका ही है, जिसकी विदेशी नीति अफगानिस्तान की विफलता और इस्लामी आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों के कारण संदेहास्पद रही है। इसमें भारत के लिए मुख्य चिंता का विषय यह है कि रूस- भारतीय भूखंडों पर कुदृष्टि रख रहे चीन के साथ-साथ देश के सभ्यतागत शत्रु- पाकिस्तान के साथ भी प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से निकट आ रहा है। यह बीते वर्षें में रूस-पाकिस्तान के बीच हुए कई समझौतों (सुरक्षा सहित) से स्पष्ट भी है।

 

‘वामपंथी’ चीन और ‘इस्लामी’ पाकिस्तान के बीच ‘अस्वाभाविक’ मित्रता भारत-विरोध के नाम पर ही टिकी हुई है। किंतु रूस से भारत के संबंध सोवियत संघ कालखंड से मधुर और प्रगाढ़ रहे है। गत वर्ष दिसंबर में जब में रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत दौरे पर आए थे, तब न केवल दोनों देशों के बीच 28 समझौते हुए थे, साथ ही पुतिन ने कहा था, “…हम भारत को एक महान शक्ति, एक मित्र राष्ट्र और समय की कसौटी पर खरा उतरने वाले मित्र के रूप में देखते हैं..।” यही नहीं, जब भी चीन-पाकिस्तान मिलकर कश्मीर पर वैश्विक लामबंदी का प्रयास करते है, तो रूस अन्य कई देशों की भांति प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से भारत के समर्थन में खड़ा मिलता है। इसका एक बड़ा कारण हथियार खरीद के मामले में भारत का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा आयातक, तो रूस का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक होना है। किंतु हाल के वर्षों में घटनाक्रम तेजी से बदला है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मोदी सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी राष्ट्रीय योजनाओं के कारण हथियारों के आयात में 33 प्रतिशत की कमी आई है और इससे प्रभावित देशों में से एक- रूस भी है। यह ठीक है कि सभी जिम्मेदार देशों की विदेश-नीति में अपना हित सर्वोपरि होता है, किंतु उन्हें श्रेष्ठ जीवंत जीवनमूल्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आशा है कि रूस, चीन-पाकिस्तान की घोषित भारत-विरोधी नीति का हिस्सा नहीं बनेगा।

 

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।

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