⚔️सलेर कंवर(हाड़ी रानी)⚔️

भारत के इतिहास में ऐसे कई मौके आए जब महिलाओं ने हंसते हंसते देश के लिए बलिदान दे दिया। आज हम आपको इतिहास की उस घटना की बारे में बताते है जब एक रानी ने विवाह के मात्र सात दिन बाद अपना शीश स्वयं अपने हाथों से काटकर पति को निशानी के तौर पर रणभूमि में भिजवा दिया, ताकि उसका पति उसके ख्यालों में खोकर कहीं अपने कर्त्वय पथ से डिग न जाए। शादी को महज एक सप्ताह हुआ था। उस रानी के हाथों की न मेहंदी छूटी थी और न ही पैरों का आलता, लेकिन उसने मातृभूमि के रक्षार्थ में गए अपने पति को कर्तव्य पथ से डिगने नहीं दिया। और हँसी-खुशी अपने प्राण न्योछावर कर दिए। तो आइए पढ़ते हैं उस वीरांगना के बारे में जिसे लोग ‘हाड़ी रानी’ के नाम से जानते हैं।।

● हाड़ी रानी कौन थीं!

हाड़ी रानी बूंदी के शासक भाव सिंह हाड़ा के पुत्र संग्राम सिंह हाड़ी की पुत्री थी। हाड़ी रानी का जन्म बसंत पंचमी के दिन 17वीं शताब्दी के प्रथम कालखंड में हुआ था। हाड़ी रानी के बचपन का नाम सलेह कंवर था।

सलेह कंवर बचपन से ही तेज़ तर्रार थीं। कहते हैं कि संग्राम सिंह ने उनकी परवरिश अपने पुत्र की भांति ही की थी, यही वजह है कि उनकी ख्याति दूर दूर तक फैलने लगी। सलेह कंवर से प्रभावित होकर सलूंबर (उदयपुर) के जागीरदार और मेवाड़ राज के सेनापति रावत रतनसिंह चूंडावत ने उन्हें अपनी रानी के रूप में चुना। मेवाड़ के स्वर्णिम इतिहास में हाड़ी रानी का नाम अपने स्वर्णिम बलिदान के लिए अंकित है। यह उस समय की बात है जब मेवाड़ पर महाराणा राजसिंह (1652 – 1680 ई०) का शासन था। इनके सामन्त थे सलूंबर के चुण्डावत रतन सिंह। जिनसे हाल ही में हाड़ा राजपूत सरदार की बेटी से शादी हुई थी। लेकिन शादी के सात दिन बाद ही राव चुण्डावत रतन सिंह को महाराणा राजसिंह का सन्देश प्राप्त हुआ था। जिसमे उन्होंने रावत चुण्डावत रतन सिंह को दिल्ली से ओरंगजेब के सहायता के लिए आ रही अतिरिक्त सेना को रोकने का निर्देश दिया था। चुण्डावत रतन सिंह के लिए यह सन्देश उनका मित्र शार्दूल सिंह ले कर आया था। यह सन्देश मिलते ही  चुण्डावत रतन सिंह ने अपनी सेना को युद्ध की तैयारी का आदेश तो दे दिया लेकिन वो पेशोपेश में थे। जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो वह महाराणा द्वारा भेजे गए सन्देश को लेकर अपनी पत्नी हाड़ी रानी के पास पहुँच गए और सारी कहानी कह सुनाई। हाड़ी रानी ने अपने पति के मनोस्थिति को भांप लिया। आश्चर्य मिश्रित शब्दों में हाड़ी रानी पति से बोली। प्रिय! पति के शौर्य और पराक्रम को परखने के लिए लिए ही तो क्षत्राणियां इसी दिन की प्रतीक्षा करती है। वह शुभ घड़ी अभी ही आ गई। देश के शत्रुओं से आपको दो-दो हाथ होने का अवसर मिला है। मेरी चिंता आप मत कीजिए। समय आने पर मैं मरने-मारने में सक्षम हूँ। आप जाएं स्वामी, मैं विजय माला लिए द्वार पर आपकी प्रतीक्षा करूंगी।

इसके बाद उन्होंने अपने पति को युद्ध में जाने के लिए तैयार किया। उनके लिए विजय की कामना के साथ उन्हें युद्ध के लिए विदाई दी। सरदार चुण्डावत जोश से भरे हुए अपनी सेना के साथ अपने प्रिय घोड़े पर चढ़ हवा से बातें किये जा रहे थे। किन्तु उनके मन में रह-रह कर आ रहा था कि कही सचमुच मेरी पत्नी मुझे बिसार न दें? वो सोच रहे थे कि उनके पीछे रानी की देखरेख कौन करेगा? वह मन को समझाते पर उसक कर उनका ध्यान उधर ही चला जाता। अंत में उनसे रहा न गया।उन्होंने आधे मार्ग से अपने विश्वस्त सैनिकों के हाथों रानी के पास संदेश भेजा, “फिर कराता स्मरण तुम्हें,मुझे भूलना मत। मैं जरूर लौटूंगा, मेरी राह तकना” दुसरे दिन एक और वाहक आया। फिर वही बात लिखी थी सरदार ने। तीसरे दिन फिर एक वाहक सरदार का संदेश लेकर आया। इस बार सरदार ने लिखा था, “प्रिय मैं यहां शत्रुओं से लोहा ले रहा हूं। अंगद के समान पैर जमाकर उनको रोक दिया है। मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाएं। यह सब तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है। प्रिये! पत्र वाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवश्य भेज देना। उसे ही देखकर मैं मन को हल्का कर लिया करुंगा।”

● “सिर काट दे दियो क्षत्राणी ने”

हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयीं। युद्धरत पति का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे! विजय श्री का वरण कैसे करेंगे! इसके बाद रानी के मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली, वीर! मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूं। इसे ले जाकर स्वामी को दे देना। मैं तुम्हें जो देती हूं उसे थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढ़ककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किन्तु वीर! ध्यान रहे कि इसे कोई और न देखे। इसे स्वंय वे ही खोल कर देखें। साथ में मेरा यह पत्र भी आप उन्हें दे देना। हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था, प्रिय! मैं तुम्हें आपको अंतिम निशानी भेज रही हूं। आपके मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं। अब आप निर्मोही होकर अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली… स्वर्ग में आपकी बाट जोहूंगी। पत्र लिखकर हाड़ी रानी ने सिपाही को दे दिया और पलक झपकते ही अपने कमर से तलवार निकाल, एक झटके में अपने सिर को धड़ से अलग कर दिया। रानी का शरीर धरती पर लुढ़क पड़ा। सिपाही के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। लेकिन कहते हैं न, कर्तव्य कर्म कठोर होता है। सैनिक ने खुद को मजबूत बनाते हुए स्वर्ण थाल में हाड़ी रानी के कटे सिर को सजाया। उसे सुहाग के चूनर से ढका। इसके बाद भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा। “सिपाही को देखकर सरदार स्तब्ध रह गए उन्हें समझ में नहीं आया कि उसके नेत्रों से अश्रुधारा क्यों बह रही है?” धीरे से सरदार बोले क्यों यदुसिंह! रानी की निशानी ले आए? यदु सिंह ने कांपते हाथों से थाल को सरदार की ओर बढ़ा दिया। चुण्डावत सरदार फटी आंखों से पत्नी का सिर देखते रह गए।

( शेष आगे )

( शेष भाग – 3/3 )

उनके मुख से केवल इतना निकला उफ्‌ हाय रानी। तुमने यह क्या कर डाला। मोह में बंधे पति को इतनी बड़ी सजा दे डाली तुमने। खैर, मैं भी तुमसे मिलने आ रहा हूं। मेरी प्रतीक्षा करना प्रिये! हाड़ी रानी के शीश को देखने के बाद, सरदार चुण्डावत के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे। वह शत्रु पर बिजली की भांति टूट पड़े। इतिहासकार लिखते हैं कि रानी के अनोखी निशानी को देखने के बाद चुण्डावत सरदार ने इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है। उनकी तलवार दुश्मनों पर काल बनकर टूट रही थी। जीवन की आखिरी सांस तक वह लड़ते रहे। औरंगजेब की सहायक सेना (जो संख्या में अधिक थी) को उन्होंने आगे नहीं बढऩे दिया,वह तब तक डटे रहे जब तक मुगल सैनिक मैदान छोड़कर भाग नहीं गए।

टिप्पणी : यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखते हैं तो ये सवाल मन में घर करता है कि, इस विजय का श्रेय किसे दिया जाए, राणा राजसिंह को या सरदार चुण्डावत को? हाड़ी रानी को अथवा उनकी उस अनोखी निशानी को? सम्भवतः ये सवाल आसान नहीं है। और इसके अपने-अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन मुझसे कोई पूछे कि इस युद्ध विजय का श्रेय किसे दिया जाए तो मेरे अनुसार केवल और केवल एक ही नाम है, वीरांगना सलेर कंवर (हाड़ी रानी) जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देने से पहले एक बार भी नहीं सोचा। और रानी के इस बलिदान को सरदार ने व्यर्थ नहीं जाने दिया। किंतु ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हाड़ी रानी के विषय में वामपंथी इतिहासकारों द्वारा न के बराबर ही लिखा है। बहुत खोजबीन करने के बाद उनके बारे में आपको शायद ही कुछ पढ़ने मिलेगा। जबकि रानी हाड़ी और चुण्डावत सरदार के बलिदान को इतिहास में भुलाया नहीं जा सकता है।

हम नमन करते हैं उस हाड़ी रानी को जिनके किस्से को आज भी राजस्थान के लोग बड़े गर्व से सुनाते हैं और गाते हैं

“चुण्डावत मांगी सैनाणी ने,
सिर काट दे दियो क्षत्राणी ने”

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