गिद्धों को होता है बस लाशें गिरने का इंतज़ार

ठीक एक साल पहले के आज के ही समय को थोड़ा सा याद करने से पता चल जाता है कि पिछले साल ठीक इसी समय के आसपास , आज जो पीपली लाइव लखीमपुर खीरी में चल रहा है /चलाया जा रहा है वो तब हाथरस में चलाया जा रहा था। दोनों ही घटनाएं/दुर्घटनाएं या अपराध अलग अलग परिप्रेक्ष्य के और अलग गंभीरता के थे। मगर दोनों ही और बल्कि दोनों ही क्यों ऐसी किसी भी घटना को सियासी रंग देने के लिए उतावला विपक्ष अब बस उन गिद्धों के झुडं की तरह हो गया है जिसे बस लाशें गिरने का इंतज़ार रहता है।
अब ये सब भी इस देश में इतनी बार और इतने सारे लोगों द्वारा दोहराया जा चुका है कि सबकुछ एक तयशुदा टूलकिट का एक्ज़िक्यूशन जैसा लगता है। घटना /दुर्घटना की फोटो और वीडियो के सहारे पहले उसे सोशल मीडिया में तूल देना फिर हैश टैग चला कर अपने पक्ष में हवा तैयार करना और फिर एक एक करके अपने चेलों चपाटों और चमचों की फ़ौज लेकर , कैमरा कर मीडिया एक एक पूरा शहर अपने साथ लेकर सब निकल पड़ते हैं अपनी सियासी बोटियाँ नोचने के लिए।
कल्पना करके देखिये कि जिस परिवार से , जिस भी परिस्थति में कोई अपना यूँ अकारण चला जाता है उसे 24 घंटे भी नहीं होते कि पीपली लाईव मीडिया और बिलकुल बेरोजगार और बुरी तरह बिफरा हुआ विपक्ष उस परिवार और उससे जुड़े एक एक सदस्य को जैसे मसालेदार खबर और अपना वोट बैंक साधने का फार्मूला समझ लेता है।
टीवी और कैमरों के बीच परिवार के सदस्यों को गले लगाकर सिर्फ और सिर्फ ये समझाया जाता है कि देखो ये जो योगी मोदी हैं और ये जो इनकी सरकार है बस यही एक भरोसे लायक नहीं हैं। नहीं पिछले सत्तर सालों तक गिद्ध की तरह देश और समाज को नोचते हुए विपक्षी दल जो अब सत्ताच्युत होकर सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक मोड में चले गए हैं वही कुछ भला कर सकते हैं पीड़ितों का।
अगली लाशें गिरने तक भी यही योजनाएं बनाईं जाती हैं कि अब कहाँ और कैसी आग भड़कानी है जिस पर सेंक सेंक कर सभी अपनी सियासी रोटियाँ सेकते रहें।
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