25 मई, 2020 जार्ज फ्लाॅयड, नशीली दवाएँ रखने के कारण, मिनियापोलिस में गिरफ्तार होते वक्त पुलिस के हाथों मर जाता है। याद है ? फिर अमेरिका में दंगे शुरू हो गये। पुलिस और प्रशासन अचानक गोरे, व्हाइट हो गये, और प्रशासन की एक गलती गोरों का काले लोगों के ऊपर ऐतिहासिक अत्याचार बन गई। एक प्रशासनिक दुर्घटना को, नस्ली हिंसा बना दिया गया। कोरोना से जूझ रहे ट्रंप के ताबूत में ये मजबूत कील साबित हुई।
राकेश टिकैत फ्रस्ट्रेशन में सच कह गया, गौर करने की बात है। “सरकार ने गोली क्यों नहीं चलाई ?” ये शायद दुनिया का पहला आंदोलनकारी नेता है, जो एकदम खुलेआम अपने साथियों को मारने की वकालत कर रहा है। किसी की मौत हो इसकी हड़बड़ी कितनी थी, ये राजदीप सरदेसाई के उस नौकरी खाऊ ट्वीट ने दर्शा दिया, जिसमें अपने ही ट्रैक्टर-नाच से दुर्घटनाग्रस्त होकर मरे को भी पुलिस की गोली से मरा किसान बता दिया गया। एक वरिष्ठ पत्रकार, इतना बड़ा झूठ बोलने का जोखिम क्यों ले रहा था ? और फिर आ गई “रिहाना”, जिसके ट्वीट पर नाचे अपने मैगसैसे कुमार।


वो तो भला हो ग्रेटा थुनबर्ग का। 18 साल की ये लड़की, जो 15 बरस की उम्र से वामपंथियो के “झँड़” हुए चेहरे का मुखौटा बनी है, थोड़ी मंदबुद्धि है, क्योंकि भारत के 18 साल के बच्चे इससे ज्यादा ‘टेक-सैवी’ जरुर होते हैं। ग्रेटा थुनबर्ग के ट्वीट ने गलती से ये उजागर कर दिया कि ये वामीस्लामी-खालिस्तानी गिरोह का अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र था, जो साल भर पहले ही डिजाइन कर लिया गया था। वे यहाँ भारत में भी एक जार्ज फ्लाॅयड ढूँढ रहे हैं, 2019 से ही, चाहे वो CAA हो या कृषि बिल का विरोध।


अब ये भी समझ में आ रहा है कि एकदम ‘फ्रंट-फुट’ पर खेल रहे अमित शाह, अचानक ‘बैकफुट’ पर क्यों खेलने लगे, क्योंकि खुफिया एजेंसियों को इस षडयंत्र की खबर शुरू से ही होगी, और उन्हें इन वामीस्लामियों तथा खालिस्तानियों को कोई जार्ज फ्लाॅयड नहीं देना है।
पर एक सवाल फिर भी रह जाता है। अभी भारत में कोई चुनाव तो है नहीं कि वे ट्रंप की तरह मोदीजी की गद्दी कुतर जाएँगे। फिर ये अंतर्राष्ट्रीय नौटंकी क्यों चल रही है ? इसका उत्तर मोदीजी के इस दूसरे कार्यकाल में है। एक तो वामीस्लामियों को ये शायद अंदाजा नहीं था कि मोदी और ताकतवर होकर उभरेंगे, और उभरकर अपना राष्ट्रवादी चेहरा और मजबूती से सामने रखेंगे।


ये जितने सारे तथाकथित आंदोलन हैं, ये मोदी जी के द्वारा किसी न किसी बिल के विरोध में ही इसीलिए करते हैं  ताकि मोदी जी अपना राष्ट्रवादी एजेंडा संविधान तक न ले आएँ, कोई भी बड़े परिवर्तन लाने वाले बिल, जैसे “समान नागरिक कानून”, “जनसंख्या नियंत्रण” जैसे उपाय पर आगे ही न बढ़ें। व्यूह रचना तो यही लग रही कि छोटी-छोटी चीजों पर भी इतना बवाल मचाओ, कि बड़े परिवर्तन की हिम्मत ही न हो। वामियों का यही एजेंडा है। और इस्लामी ? उन्हें एक कमजोर राष्ट्रवाद तब तक चाहिए, जब तक “गज़वा-ए-हिंद ” न हो।


चाहे वे जितना चिल्लाएँ, मोदी, इन वामीस्लामियों को एक जार्ज फ्लाॅयड नहीं देगा। वो इन देशतोड़ू प्रदर्शनों को उनकी स्वाभाविक मौत ही मारेगा। बचे हम और आप… तो हमें इन बिचौलीयों, आतंकियों, देशद्रोहीयों को झेलना भी है, और मोदी के पीछे एकजुट खड़े भी रहना है। कठिन समय है ये, लेकिन सामने मोदी है।

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