卐|| ॐ श्री परमात्मने नमः ||卐
■ अनछुए प्रश्न ■
● हिन्दुत्व क्या है? ●

महोदय,
हिंदू रिसर्च फाउंडेशन, मुंबई ने हिंदू, हिंदुत्व तथा हिंदुस्तान जैसे शब्दों की आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता के परिप्रेक्ष्य में लिखा है। उनका आशय है कि संप्रति ‘हिंदू’ शब्द की उत्पत्ति पर विचार करने में समय बर्बाद न कर हिंदू- धर्म के प्रचार- प्रसार की बात सोची जाए तो अधिक उपयोगी होगी।
उनका यह सुझाव सार्थक प्रतीत होता है, है नहीं। ‘हिंदू’ शब्द को लेकर संस्था बनाना, हिंदू नाम पर आहें भरना, पश्चाताप करना, आंसू बहाना अलग बात है। प्रश्न है कि हिंदू- धर्म क्या है, जिसका प्रचार- प्रसार किया जाय? इसके लिए धर्म को मूल रूप में जानना, उद्गम से ही उसका साफ- सुथरा परिचय देना होगा।
आश्चर्य होता है कि संस्था का नाम ‘हिंदू रिसर्च फाउंडेशन’ होते हुए भी जब वे ‘हिंदू’ शब्द की उत्पत्ति के विषय में सोच नहीं सकते तो रिसर्च कौन- सा करते हैं। मूल तथ्यों से पलायन कोई रिसर्च तो है नहीं।
आंग्ल भाषा में टंकित उनका पत्र पन्द्रह बिंदुओं में है। विषय को रेखांकित करने के अनंतर पत्र की आरंभिक पंक्तियों में उन्होंने ध्यान दिलाया है कि भारत की ८५ प्रतिशत जनता हिंदू- धर्म स्वीकार करती है। बेशक स्वीकार करती है; किंतु कब तक कर पाएगी? हां, यदि उसे अपना उद्भव और धर्म की व्याख्या मिल जाए तो अवश्य उस पर आरूढ़ रह सकेगी।
द्वितीय बिंदु में उन्होंने व्यक्त किया है- ‘प्रतीत होता है कि आप हिंदू- धर्म के स्थान पर आर्य- धर्म प्रतिस्थापित करना चाहते हैं।’ उनका यह निष्कर्ष भी भ्रमपूर्ण है।
हम सबका आदि धर्मशास्त्र गीता है। मनुष्य बाद में जन्मा, गीता पहले प्रसारित हुई। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा, अर्जुन! इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में अर्थात् सृष्टि के आरंभ में मैंने सूर्य से कहा। सूर्य ने अपने पुत्र आदि मनु से कहा। मनु महाराज ने इस अविनाशी योग को अपनी स्मृति में धारण कर लिया और स्मृति की परंपरा दी। उन्होंने यही योग अपने पुत्र महाराज इक्ष्वाकु से कहा, इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना। इस महत्वपूर्ण काल से यह अविनाशी योग इस पृथ्वी पर से लुप्त हो गया था, मनुष्यों की स्मृति- पटल से ओझल हो गया था, लोग भूल गए थे- वही पुरातन योग, अविनाशी योग मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूं; क्योंकि तू प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है। अर्जुन ने कुछ तर्क- वितर्क के पश्चात् स्वीकार किया कि “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।” मोह से उत्पन्न मेरा अज्ञान नष्ट हुआ। गोविंद! ‘स्मृतिर्लब्धा’- जो मनु महाराज ने स्मृति में धारण किया था, जिस स्मृति की परंपरा दी, मैं उस स्मृति को प्राप्त हुआ हूं। यही अविनाशी योग मैंने स्मृति में धारण कर लिया। मैं आपके आदेशों का पालन करूंगा। अर्जुन युद्ध के लिए प्रस्तुत हो गया। युद्ध हुआ, विजय हुई, एक धर्मसाम्राज्य की स्थापना हो गई। एक संपूर्ण धर्मात्मा नरेश युधिष्ठिर अभिषिक्त हुए और एक ही धर्मशास्त्र गीता पुनः प्रसारण में आ गई।
गीता के आरंभ में ही अर्जुन ने कहा, गोविंद! में युद्ध नहीं करूंगा क्योंकि कुल धर्म सनातन है। “जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः”- यह जाति धर्म और कुलधर्म ही शाश्वत है। युद्धजनित नरसंहार से पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जाएगी, पितर लोग गिर जाएंगे, वर्णसंकर हो जाएंगे इत्यादि। हमलोग समझदार होकर भी पाप करने को उद्यत हुए हैं। शस्त्रधारी कौरव मुझ शस्त्रविहीन को मार डालें तो मरना श्रेयस्कर है। गोविंद! मैं युद्ध नहीं करूंगा। यह पाप है- एक धार्मिक भ्रान्ति ने अर्जुन को मौत के मुंह में धकेल दिया। गीता के विस्मृत होने का दुष्परिणाम था कि अनेक भ्रांतियां फैल गई, जिनमें से एक भ्रान्ति का अनुयाई अर्जुन भी था। जिन कौरवों ने इनके लिए लाक्षागृह का निर्माण कराया, भीम को विष दिया, वनवासकाल में राक्षसों को नियुक्त किया कि ध्यानरत अर्जुन को मार डालो, वे अर्जुन को निःशस्त्र पाकर क्यों छोड़ देते? किंतु भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, अर्जुन! तुझे यह अज्ञान किस हेतु से उत्पन्न हुआ। यह न कीर्ति करनेवाला है, न कल्याण करनेवाला है और न ही पूर्व महापुरुषों ने भूलकर भी ऐसा आचरण किया। यह “अनार्यजुष्टम्”- अनार्यों का आचरण तूने कहां से ले लिया। भगवान् ने बहुत समझाया, अर्जुन ने तर्क- वितर्क किया, अंततः उसे दृष्टि मिली, भगवान् का दर्शन किया तब कुछ समय में आया। अस्तु, जाति- पाँति, छुआछूत, भेदभाव, पिण्डोदक क्रिया भगवान् के शब्दों में अज्ञान है, अनार्यों का आचरण है।

आर्य कोई धर्म नहीं, प्रजाति नहीं, एक व्रत है। अस्तित्ववान् अविनाशी एक परमात्मा है। जो उस एक परमात्मा का उपासक है, उसे प्राप्त करने के नियत विधि का आचरण करता है, आर्य है। गीता आर्य- संहिता है।
गीता के अनुसार आत्मा ही शाश्वत है, सनातन है। जो सदा हृदय- देश में विद्यमान है। हम शाश्वत, सनातन के पुजारी हैं। गीता सनातन की प्राप्ति की संहिता है इसलिए भारतीय सनातनधर्मी कह जाते थे। हम उस हृदयस्थ परमात्मा के पुजारी हैं इसलिए हिंदू कहे जाते हैं। हृदय में ही उस परमतत्व परमात्मा का निवास है। साधना की सही प्रक्रिया से चलकर जब कभी किसी ने उस परम प्रभु को पाया तो हृदय- देश में प्राप्त किया। संसार एक रात्रि है- ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’ जगतरूपी रात्रि में भी वह ईश्वरीय प्रकाश सबके हृदय में एकरस विद्यमान रहता है। रात्रि में तो इन्दु अर्थात् चंद्रमा ही रहता है। इसलिए हृदि इन्दु स हिंदू- हृदय में वह चंद्रमा के सदृश सदा प्रकाशित है। यह जीवनी शक्ति के रूप में सदा प्रवाहित है इसीलिए इसका एक नाम हिंदू भी है। जब परमात्मा विदित हो जाता है तब पूर्ण प्रकाश है, रात्रि समाप्त हो जाती है। ईश्वरीय आलोक छा जाता है। वहां न रात है न दिन। यह आर्यावर्त, सनातनी, हिंदू अर्थात् हृदयस्थित परमात्मा के व्रती सबका एक ही आशय है। इन नामों का स्मरण कर हम कुछ बदल नहीं रहे हैं, कोई नया नामकरण करने नहीं जा रहे हैं; केवल यह बता रहे हैं कि कालक्रम से ये नाम हमारे ही हैं। हम मूल नाम दे रहे हैं, आपको इतिहास से जोड़ रहे हैं। कालक्रम से भाषाएं बदलती गई, नाम बदलते गये; किंतु मूलतः हम वही हैं और हम सबका शास्त्र भी वही ‘गीता’ ही है।
पत्र के तृतीय बिंदु में उन्होंने पुनः याद दिलाया है कि पचासी प्रतिशत भारतीय अपने को हिंदू कहते हैं, संसार उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता देता है। अरब निवासी इस देश को हिंदुस्तान कहते हैं और आप- जैसे हिंदू शब्द की उत्पत्ति खोज रहे हैं।
वस्तुतः यह कार्य तो शोध संस्थान का ही था कि अपने गौरवशाली अतीत का भी स्मरण करते। वे तो इतने में ही संतुष्ट हैं कि पचासी प्रतिशत भारतीय अपने को हिंदू कहते हैं। भले ही कहते हों किंतु संतुष्ट कोई नहीं है। विगत दो-तीन सौ वर्षों में करोड़ों हिंदू सिख के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, चौबीस करोड़ हिंदू ईसाई हो गए, तीस- बत्तीस करोड़ मुसलमान बन गए। अंबेडकर ने कहा था कि मैं हिंदू जन्मा अवश्य हूं इसमें मेरा कोई वश नहीं था किंतु मैं हिंदू रहकर मरूंगा नहीं। उत्तर प्रदेश और बिहार के हरिजन अपने को बौद्ध लिखने लगे हैं। नागपुर में अंबेडकर जयंती पर दस लाख लोग एकत्रित हुए थे, बौद्धिष्ट बनने हेतु। यदि जाति- पाँती छुआछूत और जातीय विद्वेष का नाम ही हिंदू धर्म है तो कितने लोग हिंदू रह जाएंगे? मुंबई के समीप गोवा, असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, केरल, कश्मीर इत्यादि राज्यों में हिंदुओं की संख्या में ह्रास स्वतंत्रता के पश्चात् हुआ है। जब तक आप धर्म की परिभाषा नहीं देंगे, धर्मशास्त्र के रूप में गीता नहीं देंगे, केवल हिंदू- हिंदू कहने से धर्मांतरण नहीं रुकेगा। हिंदू आश्वस्त नहीं है। उसे धर्म पर विश्वास दिलाना होगा ताकि वह इस पर टिक सके।
वेदशास्त्र की धमकी देकर, साइनबोर्ड इसका दिखाकर भारत में अलग से एक शास्त्र चलाया जाता था, जिनका नाम था स्मृतियां, जैसे- मनुस्मृति, पाराशर स्मृति, देवल स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति इत्यादि। महापुरुषों के नाम से प्रचारित इन स्मृतियों में है- शूद्र भगवान् का भजन नहीं कर सकता। वह वेदवाक्य पर विचार करने मात्र से नरक मिल जाएगा। उसे सुनकर स्मरण करता है, मन में दुहराता है, तब भी नरक जाएगा। जिह्वा से वेद का उच्चारण कर दे तो उसकी जिह्वा काट लो। यदि यही है आपका हिंदू- धर्म, वेद और शास्त्र तो कौन इस व्यवस्था में जीना चाहेगा? ..

शोध संस्थान वालों ने तर्क दिया है कि दक्षिण भारत के लोग अपने को आर्य नहीं मानते ‘द्रविड़’ मानते हैं, हिंदू मानते हैं। आर्य- दर्शन का प्रचार करने से उत्तर- दक्षिण भारतीयों में घृणा पनपेगी। राष्ट्रीय- गान आपको स्मरण ही होगा। पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल, बंग। विंध्य, हिमाचल …….। ये भू- भाग के नाम हैं। एक श्लोक निरंतर पढ़ने में आता है- ‘जम्बूद्विपे, भारतखण्डे आर्यावर्ते ………’ जम्बू एक द्वीप है, जिसमें भारत एक खंड है, जिसमें आर्यव्रती लोग निवास करते हैं। आर्य एक व्रत है, किसी भू- भाग का नाम नहीं। भारत के प्रांतों के नाम हैं- द्रविड़, गुजरात, मराठा आदि। आर्य कोई भू- खंड नहीं वरन् एक व्रत है, गुणवाचक है। आर्य कोई प्रजाति है, यह विष- वमन तो अंग्रेजों का को कुप्रचार है। प्राचीन आर्षग्रंथों में ‘आर्य’ शब्द की व्याख्या पर्याप्त है। भगवान् वाल्मीकि, भगवान बुद्ध की वाणी में, भगवान् महावीर और भगवान् व्यास की वाणी में ‘आर्य’ शब्द पर प्रचुर प्रकाश डाला गया है। इनमें से किसी का उदाहरण न देकर आर्यों के विषय में अंग्रेजों ने क्या कहा? मैक्समूलर ने मद्धेशिया, तो किसी ने काकेशस पर्वत को उनका मूल निवास बताया; क्योंकि वहां संस्कृत भाषा के दो-चार शब्द मिले हैं। क्या यह संभव है कि आर्य जब भारत आने लगे, मूल निवास से सब कुछ अपने साथ बाँध लाए और वहां संस्कृत के दो-चार शब्द ही छोड़ा? एक भी वेद उन पूर्वजों के गांव में नहीं छोड़ा? आर्य और अनार्यों में फूट डालकर राज्य करो, अंग्रेजों की दूरभिसंधि थी, जिसका शिकार आंग्लभाषी विश्वविद्यालयों के छात्र हुए। यदि छात्र यही सब लिखें तो उत्तीर्ण कैसे होते? ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत लार्ड मैकाले की कुत्सित शिक्षा योजना का परिणाम आर्य और अनार्यों का विभाजन है। आर्यों की विशुद्ध परिभाषा आश्रमीय साहित्य ‘यथार्थ गीता, शंका समाधान, जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ इत्यादि पुस्तकों में द्रष्टव्य है। दक्षिण भारतीय भी आर्य ही है। अंगद आर्य थे, विभीषण आर्य थे, रावण के पिताश्री भी आर्य ही थे। आरंभिक आर्य सूर्य, चंद्र, कुबेर, वरुण इत्यादि थे। भगवान् श्रीकृष्ण आर्य थे। आर्य एक व्रत है, जो अस्तित्व एकमात्र परमात्मा के प्रति आस्थावान् है, आर्य है न कोई प्रजाति या धर्म। धर्म तो साधना का नाम है, साधना को धारण करना धर्म है।
शोध संस्थान को संतोष है कि अरबवाले इस देश को हिंदुस्तान तो कहते हैं। मुसलमान हिंदुओं को काफिर भी कहते हैं, नास्तिक मानते हैं, पापी मानते हैं और हिंदुस्तान को पाक करने के षड्यंत्र करते ही रहते हैं, कभी जनेऊ जलाया गया, चोटी काटी गई तो कभी जजिया कर लगाया गया। उस युग में तीन विभूतियां ऐसी निकल आयीं, जिन्होंने हिंदुओं को समूल नष्ट होने से बचा लिया। वह थे- ‘महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह जी और छत्रपति शिवाजी।’ इन तीनों ने ही हिंदुओं की दकियानूसी परंपरा का पालन नहीं किया। महाराणा प्रताप ने कोल- भीलों को शस्त्र पकड़ा दिया, इन्हीं में रहे, साथ भोजन किया, उन्हें सम्मान दिया। ‘महाराष्ट्र में जो जन्मा है, मराठा है’- कहकर शिवाजी ने सबको शस्त्र पकड़ा दिया। गुरु गोविंद सिंह जी ने शिष्यों को शस्त्र धारण कराया, कहा, ‘सभी सिंह है’। कर्मकांडी लोग पीछा करते ही रह गए। इन महापुरुषों ने उन्हें भगा दिया। सबके साथ खाना- पीना, रहना उनका हिंदू- धर्म था। आर्य शब्द को विकृत करने के प्रयास हुए हैं, इसीलिए लोगों में इस शब्द से भ्रांति है। दयानंद जी ने भी इसकी उत्पत्ति तथा प्राचीन ग्रंथों में इस शब्द की व्याख्या पर ध्यान नहीं दिया। जब उन्होंने वेद को शास्त्र कहा, तो लोगों ने स्मृति को शास्त्र बताया। अब मूलस्मृति के रूप में गीता आ गई तो कहते हैं वेद शास्त्र है? दयानंद जी को मुसलमानों ने नष्ट नहीं किया, ईसाईयों ने नहीं किया इन्हीं हिंदुओं ने किया। दयानंद जी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का आदर्श ही दे रहे थे। किंतु विश्व में फूट डालने वालों ने ही उन्हें हर बार विष द्वारा मारने का प्रयास किया; अतः वेद धर्म है, शास्त्र धर्म है- एक ढाल मात्र है। इनका नाम लेने से लोगों की श्रद्धा झुक जाती है। जाल फेंककर चना दिखाकर बंदर पकड़ने जैसी गर्हित कला है।
शोध संस्थान को गर्व है कि विदेशी लोग भारतीयों का हिंदूरूप में आदर करते हैं। एक उदाहरण पर्याप्त होगा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, हिटलर और मुसोलिनी से भारत की स्वतंत्रता के लिए सहयोग चाहते थे। उनका (हिटलर आदि का) विचार था कि भारत कभी आजाद हो ही नहीं सकता। भारतीय अपना शासन स्वयं करने में सक्षम नहीं है। भारत जातियों, उपजातियों, विविध धर्मों और भाषाओं में, भाई- भतीजावाद, पक्षपात, जातीय विद्वेष में इतना उलझा हुआ है कि आगामी दो सौ वर्षो में भी अपना शासन स्वयं चलाने योग्य नहीं हो सकता। सर्पों को बीन बजाकर या बंदर को डुगडुगी बजाकर नचाने के अतिरिक्त भारतीय कर ही क्या सकते हैं? छुआछूत, भेदभाव के कारण भारतीयों को विदेशों में जाहिलों, मूर्खों का समाज समझा जाता है।

नवम बिंदु में संस्थान के संचालक महोदय का मानना है कि ‘हिंदू शब्द पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण भारतीयों को एकता के सूत्र में बांधे हुए हैं।’ विचार करें, केरल में कितने हिंदू शेष हैं? वहां के पचासी प्रतिशत हिंदू ईसाई हो गए। कहीं कोई पंडित चंदन लगाकर निकलता है तो बच्चे ताली बजाने लगते हैं? कौन कहता है इस शब्द से सभी खुश हैं? यदि खुश ही थे तो ईसाई क्यों बन गए? क्यों बनते जा रहे हैं? जब तक धर्म की सही परिभाषा न दी जाए, बिना परिचय के कोई गर्व कैसे करेगा?
ग्यारहवाँ बिंदु भी विचारणीय है कि पूर्वज अपने को हिंदू कहते थे। भाषा, इतिहास और गीता पर प्रतिबंध लग जाने से यह ‘हिंदू’ नामकरण विस्मृत हो चला था। हिंदू शब्द दस- ग्यारह सौ वर्षों से ही पुनः प्रचलन में है। अभी पुष्यमित्र शुंग के समय में विभिन्न स्मृतियां लिखी गईं, उनमें भी हिंदू शब्द का प्रयोग नहीं है। शुंगकाल में वर्णित संस्कृत वर्णमाला, शब्दकोश इस शब्द से अनभिज्ञ है। गीता इस शब्द को अवश्य समर्थन देती है कि ईश्वर हृदय- देश में निवास करता है, सहज प्रकाश छोड़ता ही रहता है। हृदि इन्दु से हिंदू की उदारवादी व्याख्या आप देख सकते हैं। गीता वेद- शास्त्रों का भी मूल है, वसुधैव कुटुंबकम की भावना से ओतप्रोत है, संपूर्ण विश्व का यह आदि धर्मशास्त्र है।
भारत को विश्वगुरु होने का गौरव प्राप्त था, किंतु मध्यकाल में विश्व से आगंतुक शिष्यों ने कुएं में रोटी का टुकड़ा डाल दिया तो गांव का गांव मुसलमान हो गया। इस विकृति को जीवित रखने के लिए करोड़ों आचार्य लगे हैं, जिन्हें पुरोहित कहते हैं, जो घर-घर जाकर जन्म- मृत्यु या विवाह के अवसर पर विकृतियों को ही संरक्षण दे रहे हैं- ‘नमो ब्रह्मण्य देवाय, गो ब्राह्मण हिताय च …..’ उनके शिकंजे से आप कैसे बचेंगे? अतः धर्म को जानने के लिए, वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श के लिए आप सभी गीता लें। प्रचार-प्रसार का अन्य कोई वैज्ञानिक उपाय नहीं है। भगवान् ने स्वयं कहा, अर्जुन! अन्य विधियों से जो भजते हैं, उनके जीवन में न सुख है न समृद्धि है और न परमसिद्धि ही है। ‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ’- तुम्हारे कर्तव्य- अकर्तव्य की व्यवस्था में यह गीता शास्त्र ही प्रमाण है, क्योंकि जिन प्रभु को धारण करना धर्म है उन्हीं का संदेश गीता है।
शोध संस्थान को दुःख है कि आज कोई वसुधैव कुटुंबकम् की बात नहीं करता। यही मान लेते तो विश्वगुरू भारत, संसार का हर मानव शिष्य, तो शिष्यों के छूने, खाने से गुरू जी रसातल में क्यों चले जाते? आधा अरब भारत ही था। अल्ताई पहाड़, हिंदूकुश, मलाया, जावा, सुमात्रा, सिंहल, चीन, जापान और मिश्र तक भारत ही तो था। आज कैलाश मानसरोवर के लिए वीसा पासपोर्ट लेना पड़ता है। यह सिमट क्यों गया? इसकी जड़ में धार्मिक भ्रांति है जो करोड़ों में फैली है। आप एक स्थल से शिक्षा देकर इनका दुष्प्रभाव कैसे कुंठित कर सकेंगे। आवश्यकता है इन धर्माचार्यों को सही दिशा देने की। उन्हें सत्य प्रसारण की विधि प्रदान करें। उपनिषदों और वेदों का मूल है गीता, सृष्टि का आदिशास्त्र है गीता, पर शोध संस्थान की दृष्टि क्यों नहीं पड़ी?
शोध संस्थान ने अंत में सुझाव दिया है कि धार्मिक उद्देश्य से गठित संगठनों को राजनीति से पूर्ण विरत रहना चाहिए। धर्म का शुद्ध स्वरूप जिन्हें उपलब्ध है, ऐसे संगठन राजनीति में कभी जा ही नहीं सकते। धर्म उन्हें किसी में फूट डालने का अवकाश ही नहीं देता। यह तो वही कर सकते हैं जो धर्म नहीं जानते। धर्म की दृष्टि में विश्व का मानव- मात्र एक इकाई है। अन्य किसी ग्रह पर अतिरिक्त जनसंख्या है तो उसके लिए भी धर्म में इतनी जगह बनी हुई है। गीता के अनुसार, एक पिता की संतान के रूप में वे एक जगह खा- पी सकते हैं, संबंध भी कर सकते हैं।
संस्थान ने बौद्धिकों का आह्वान किया है कि उदारवादी व्याख्या द्वारा हिंदू- धर्म के प्रचार-प्रसार में लगें। वस्तुतः बुद्धि के बल पर शास्त्रों को समझने का प्रयास ही गलत है। शास्त्र कोई विरला महापुरुष जानता है और उनके संरक्षण में कोई विरला ही अधिकारी पढ़ता है। पचासों भाषा पढ़कर भी शास्त्र के विषय में कोई कुछ नहीं जानता। श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन! इस ज्ञान को जानने के लिए तत्वदर्शी महापुरुष की शरण में जाओ। रामचरितमानस में है, ‘जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी’- यह तो महापुरुषों के क्षेत्र की वस्तु है। आप उनसे परामर्श लेते रहेंगे तो कभी भी संदेह नहीं होगा। …… “हरि ॐ तत्सत्”

卐 ॐ श्री सद्गुरूदेवाय नमः 卐

[ यथार्थगीता के प्रणेता परम पूज्य सद्गुरूश्री द्वारा विरचित ‘अनछुए प्रश्न’ से लोकहित में साभार प्रस्तुत जो www.yatharthgeeta.com. पर देखा जा सकता है! ]

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