हिन्दू शब्द का फारसी मूल होने पर भूमिका –

वर्तमान समय में हिन्दुओ के प्रति दुष्प्रचार तेजीसे बढ़ रहा है. हिन्दुओ को हीनभावना से ग्रस्त करना हिन्दू विरोधी शक्तिओ का ही एक भाग है. चाहे वह विविध प्रथाओ पर उपहास या आरोप लगाना हो या किसीके व्यक्तिगत अपराध को पुरे हिन्दू धर्म पर आरोपित करना हो या  हिन्दुस्तान को रेपिस्तान बोलने जैसी बाते हो. दुःख की बात है की इन दुष्प्रचारो में प्राय: स्वयं हिन्दू ही आगे द्रश्यमान होता है जिनको वास्तविकता का ज्ञान नही होता. वर्तमान में सोसियल मिडिया पे ‘ हिन्दू ‘ शब्द को लेकर दुष्प्रचार किया जा रहा है जिसके विषय पर आज हम वार्ता करेंगे और हिन्दू विरोधिओको उचित उतर देंगे.

हिन्दू शब्द फारसी होने का सोसियल मिडिया पे वाइरल सन्देश –

सोसियल मिडिया पे एक सन्देश शीघ्रतासे वाइरल हो रहा है की हिन्दुओ तुम तो चोर , डाकू , लुटेरे हो क्योकि फारसी भाषा के अनुसार ‘ हिन्दू ‘ शब्द का अर्थ ही चोर , डाकू, लुटेरा इत्यादि होता है. ‘ हिन्दू ‘ शब्द तो तुम्हारे वेदों में है ही नहीं. यह तो विदेशी भाषा का है. यह बात जानकार बहुत से हिन्दू कमेन्ट बॉक्स में अपने अज्ञान वश यह कहते द्रश्यमान होते है की तो फीर ठीक है, हम हिन्दू शब्द को छोड़ देंगे. तो कोई कहता है की हमें स्वयं को आर्य कहना चाहिये क्योंकि आर्य का अर्थ उतम , श्रेष्ठ आदि होता है. यह बात ठीक है की हम स्वयं को आर्य कह सकते है, इसमें कोई आपत्ति नहीं है पर हिन्दू नहीं कहलाने का समर्थन करना हिन्दुओ की अज्ञानता ही होगी तथा मिथ्या  आरोप लगाने वालो को समर्थन करना होगा.

हिन्दू शब्द को फारसी भाषाका शब्द और चोर डाकू आदि समजते हिन्दुओ से मेरे प्रश्न –

हिन्दुओ, तुम्हे कोई कुछ भी कहे इससे आपको इतना फर्क क्यों पड़ता है? किसी दूसरी भाषा में क्या अर्थ होता है इससे आप इतने प्रभावित क्यों हो जाते हो? दुसरो को स्वयं से श्रेष्ठ समजकर नतमस्तक क्यों हो जाते हो? क्या तुम स्वयं के बारे नहीं जानते? कल कोई आपके नाम का कोई भी मनमाना अर्थ कर देंगा तो क्या स्वयं का नाम बदल दोंगे? कोई तुम्हे काफिर कहकर कहता है की काफ़िर तो वाजेबुल कतल है , या मुशरिक को जीने का हक़ नहीं है, तो क्या मर जाओंगे? कबतक और कहातक भागोंगे ? मेरे यही प्रश्न शुद्र शब्द को नीच, गुलाम, अधम, अस्पृश्य आदि समजने वाले हिन्दुओ से भी है. पर इसपर फिर कभी वार्ता करेंगे. अब यहाँ हम हिन्दू शब्द के मूल पर विचार करते है.

हिन्दू शब्द का मूल संस्कृत वेद ही है कोई विदेशी फारसी भाषा नहीं  –

01. हिन्दू शब्द का सबसे प्राचीनतम उल्लेख ईसा पूर्व 6th  शताब्दी के डेरिअस – 1 के शिलालेख में मिलता है. जहा पर उसने हिन्दू शब्द को सिंधु नदी के प्रदेश के लिए उपयोग किया है.

02. पंजाब के ‘ सप्त सिंधु ‘ प्रदेश को पारसिओ के प्राचीन ग्रन्थ जेंद अवेस्ता में ‘ हप्त हिन्दू ‘ कहा गया है. स्पष्ट है की ‘ हिन्दू ‘ शब्द वेद के संस्कृत शब्द ‘ सिंधु ‘ ही है. वेद में ‘ सिंधु ‘ शब्द बहुत बार नदी या अधिक मात्रा की जलराशि के लिये उपयोग में आया है. इसलिए ‘ हिन्दू ‘ शब्द का विदेशी होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता और यह भी स्पष्ट है की ‘ हिन्दू ‘ शब्द उस समय ‘ भौगोलिक प्रदेश ‘ के रूप में व्याख्यायित था. नहीं की चोर , डाकू जैसे विशेषण के तौर पर. यह भी स्पष्ट है की ‘ हिन्दू ‘ शब्द इस्लाम आदि से भी बहुत पुराना है. इसलिए इस्लाम की परिभाषा पर हिन्दू शब्द का अर्थ ग्रहण करना मुर्खता ही है. बादमे जब इस्लाम ने फारस ( ईरान आदि प्रदेश ) आदि पर कब्ज़ा कर लिया और भारत पर भी हमले और कब्जे आदि किये तब काफ़िर ( जिसने इस्लाम नहीं अपनाया हो वह लोग ) हिन्दूओ को गाली देंने के लिए यह सब अर्थ किये गए .विद्वान लोग जानते है की भारत में मा-बहन पर गालिया देने की शरुआत इस्लाम के आने के बाद ही हुई है.

03. वैदिक व्याकरण मे शब्द उत्पत्ति का आधार ध्वनि विज्ञान (नाद विज्ञान) है, ध्वनि उत्पत्ति, उद्गम, आवृत्ति, ऊर्जा आदि के आधार पर ध्वनि परिवर्तन से समानार्थी व नए शब्दों की उत्पत्ति होती है, जैसे सरित(नदी) शब्द की उत्पत्ति हरित शब्द से हुई है. “हरितो न रह्यॉ”( अथर्ववेद 20.30.4) की व्याख्या मे निघंटु मे स्पष्ट है “सरितों हरितो भवन्ति”. वैदिक व्याकरण के संदर्भ में निघंटु का निर्देश है कि “स” कई स्थानों पर “ह” ध्वनि में परिवर्तित हो जाता है. इस प्रकार अन्य स्थानों मे भी “स” को “ह” व “ह” को “स” लिखा गया है.

सरस्वती को हरस्वती- “तं ममर्तुदुच्छुना हरस्वती” (ऋग. 2।23।6),
श्री को ह्री- “ह्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ”
 आदि-आदि॥

इसी प्रकार हिन्दू शब्द वैदिक सिंधु शब्द की उत्पत्ति है क्योंकि सिंधु शब्द से हिंदुओं का सम्बोधन विदेशी आरंभ नहीं है जैसा कि इतिहास मे बताने का प्रयास होता है वरन वैदिक सम्बोधन है.

 “नेता सिंधूनाम” (ऋग 7.5.2), “सिन्धोर्गभोसि विद्दुताम् पुष्पम्”(अथर्व 19.44.5) आदि मंत्र वेदोमे मिलते है.

04. बृहस्पति आगम में कहा गया है की –

ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:

गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।

हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।

भावार्थ – ‘ॐकार’ जिसका मूल मंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है तथा हिंसा की जो निंदा करता है, वह हिन्दू है.

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥

अर्थात – हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है.

5. मेरूतंत्र में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है:- “हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।”

अर्थात – जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं. यही बात कल्पद्रुम में भी कही गई है. माधव दिग्विजय और परिजात हरण में भी हिन्दू शब्द का जिक्र मिलता है.माधव दिग्विजय और परिजात हरण में भी हिन्दू शब्द का जिक्र मिलता है.

वास्तव में प्रमाणों की सूचि ओर भी लम्बी हो सकती है पर यहाँ पर इतने से ही संतोष करेंगे. प्रमाणों से भी स्पष्ट है की हिन्दू शब्द अच्छे अर्थो में प्रयुक्त होता रहा है इस्लाम के जन्म से पहले से ही.

लेख का निष्कर्ष – ‘ गर्व से कहो हम हिन्दू है ‘

हिन्दू शब्द विदेशी भाषा का नहीं अपितु संस्कृत शब्द है. यह वेद में भी ‘ सिंधु ‘ शब्द के रूप में मिलता है. पहले यह भौगोलिक प्रदेश के रुपमे पर बाद में यह उस प्रदेश में रहने वाले लोगो के धर्म के लिए उपयोग होने लगा. इस्लाम से पहले भी अच्छे अर्थो में हमारे शाश्त्रो में मिलता है. इस्लामी आक्रान्ताओ ने काफिरों को गाली देने के लिए उपयोग में लिया. इसलिए किसीभी प्रकारकी हीनभावना का प्रदर्शन करने की आवश्यकता  नहीं है. इसलिए गर्व से कहो ‘ हम हिन्दू है ‘

निवेदन – कॉपी पेस्ट शेयर आदि करके अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाये

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