एक मित्र ने अपने विद्यालय के एक पूर्व छात्र के **SC परीक्षा में सफल होने की बात बताई और बहुत ही प्रसन्नता और गर्व की अनुभूति होने का हर्ष प्रकट किया।
पता नहीं मेरा मुंह प्रसन्नता की बजाय विषाद से क्यों भर गया, जैसे कोई विषाक्त कड़वा रस मुँह में घुल गया हो।

मैं उस छात्र को जानता भी नहीं था, फिर मेरे ही विद्यालय के एक छात्र द्वारा आईएएस निकाल लेने पर ख़ुशी की बजाय ये विषाद, मलीनता, क्यों आयी मेरे मन में ? कारण ? कारण है भारतीय प्रशासनिक परीक्षाओं और प्रशिक्षण संस्थानों से रटे-रटाये तोते की तरह निकल रहे IAS अधिकारियों के साथ हमारा अनुभव और गहरा विक्षोभ।

The Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration (LBSNAA). Image: Indian Express

नाम बड़े और दर्शन छोटे । इतना महिमामंडित किये जा रहे इन पदों की गरिमा सिर्फ इसलिये है क्योंकि ये शिर्ष पदों वाली सरकारी नौकरियां हैं जिसमें तमाम सुविधाएं, रुतबा और पैसा और पैसा कमाने की संभावनाएं हैं।
ये कोई समाजसेवा और राष्ट्र उत्थान और निर्माण का कार्य नहीं है। हो सकता है पर है नहीं।
ये भेड़ों के लिए चरवाहे नियुक्त करने जैसी बात है।
इन पदों पर आसीन अधिकारीयों का काम जनता को कोमल शावकों से सिंह की तरह निडर बनाना नहीं बल्कि भेड़ों को अच्छी भेंड़ बनाये रखना है ताकि भेंड़ें पंक्तिबद्ध चलती जाएं और सरकारों द्वारा, समय समय पर आवश्यकतानुसार उनसे ऊन और मांस लिया जाता रहे ।

आपके-हमारे बीच से उठ कर, Coaching कर के, परीक्षा पास कर, अधिकारी बन रहे ये लड़के लड़कियां, उतने ही महामानव हैं जितने आप और हम, वरना इतनी बड़ी बड़ी नौकरियां करने वाले, आम लोगों की तरह अपनी शादी में दहेज नहीं लेते, उनके तलाक नहीं होते, आये दिन गलत वजहों से सुर्ख़ियों में नहीं बने रहते । कोरोना काल में हो रही शादियों में सबको गरियाते Police-सुरक्षा से घिरे रॉब दिखाते ब्लडी डीएम हों, आम जनता का फ़ोन फेंकते थप्पड़ लगाते हुए डीएम हों या धर्मांतरण का केंद्र चला रहे जनाब आईएएस अधिकारी साहब, इनके रसूख और सरकारी-नौकरी वाली बहादुरी के किस्से कौन नहीं जानता।

इन परीक्षाओं और उनमें सफल अभ्यर्थियों का कड़वा सच ये है कि अपने प्रशिक्षण के बाद ये बस सरकारी कठपुतलियां हैं जिनकी ताकत और रॉब बस आम जनता पर, सरकार के नुमाइंदे की तरह, शासन करने के लिए होती है ।
इनका प्रशिक्षण अब भी इन्हें समाज और नागरिकों के दुख तकलीफ़ों के प्रति भावुक और द्रवित और उद्वेलित नहीं करता क्योंकि ऐसा होने पर ये व्यवस्था बिखर जाएगी और ये अधिकारी सरकारों के लिए चुनौती बन जाएंगे। भारत के सरकारी तंत्र को अंदर से चाट कर खोखला कर चुके भ्रष्टाचार के दीमक को रोकने और नष्ट करने में अन्य जिम्मेदार संस्थानों की ही तरह, भारत का IAS तबका और विभाग सर्वथा विफल रहा है और भ्रष्टाचार रोकने पर इनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखती ।

ये प्रोटोकाल-जीवी युवा जो देश की कायापलट सकते हैं, सिर्फ बाहर से इतने सक्षम और समर्थ दिखते हैं, पर अंदर से इतने विवश हैं कि ये ना ही सरकारी विभागों में घोटाला रोक सकते हैं और ना ही कुछ सही करने पर किसी मंत्री द्वारा अपना स्थानांतरण.
प्रधानमंत्री तक भी इन विभागों के समक्ष अपनी चिंता और विवशता व्यक्त कर चुके हैं।

Prime Minister Narendra Modi speaks in the Rajya Sabha | PTI

एक कार्यक्रम के दौरान, नौकरशाही के विषय पर उन्होंने अपनी निराशा प्रकट करते हुए कहा था: “सब कुछ बाबू ही करेंगे? IAS बन गए मतलब वह fertiliser का कारखाना भी चलाएगा, केमिकल का कारखाना भी चलाएगा, IAS हो गया तो वो हवाई जहाज़ भी चलाएगा? ये कौनसी बड़ी ताकत बना कर रख दी है हमने ? बाबुओं के हाथ में देश दे कर के हम क्या करने वाले हैं ? हमारे बाबू भी तो देश के हैं, तो देश का नौजवान भी तो देश का है ,”

https://theprint.in/india/governance/babu-samjho-ishare-modis-critique-of-ias-evokes-shock-but-many-also-call-for-introspection/603341/

https://theprint.in/india/governance/how-pm-modi-pulled-up-ias-officers-3-times-in-3-weeks-for-slow-pace-of-work-lacking-courage/616464/

70 सालों में अपने अफसर वर्ग की निष्क्रियता ने हमें यहां ला खड़ा किया है कि देश के हर सरकारी दफ्तर में बिना घूस के काम करवाना मजाक लगता है।

रट्टा मार के, झूठे इतिहासकारों और वामपंथ दृष्टिकोण से ओतप्रोत साहित्यों और विषयों में प्रशिक्षित ये वर्ग परीक्षाएं पास करते हैं, पर अपनी भारतीय अंतरात्मा और मर्म खो देते हैं, और फिर भारत और भारतीयों से सहानुभूति न होने के कारण, एक कार्यवाहक की बजाय शासक की तरह जनता के सिर पर आकर बैठ जाते हैं ।
हालत ये है कि अगर इन बाबुओं द्वारा कोई सही काम करते हुए कोई सोशल मीडिया पर पोस्ट और tweet कर देता है, तो लोग साधु- साधु की चीत्कार करने लगते हैं, मंगलगान गाने लगते हैं, जैसे कोई चमत्कार हो गया हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे इन बाबुओं से किसी को सही काम किये जाने की कोई उम्मीद ही नहीं होती ।

आम जनता को भगवान तो बिना किसी पुजारी के शायद मिल भी जाये लेकिन बिना बिचौलिये के दफ्तर में बैठे बाबू नहीं। सच यही है की आज भी हमारा जनमानस कोई समस्या आने पर “भगवान भरोसे” ही चलता है, उच्च पदासीन इन बाबुओं के दफ्तर की राह नहीं लेता।

मेरा, इन परीक्षाओं को पास कर, सरकारी नौकरी करने जा रहे युवाओं से कोई रोष नहीं है। लेकिन सच यही है कि देश के बाकी सरकारी नौकरियों की तरह ये भी एक नौकरी है, देश के बाकी सरकारी नौकरियों की तरह इसकी भी सीमाएं और विवशताएं है और आम जनता के लिए, वही हमेशा वाला संघर्ष ।

जय भारत ।

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