पितृपक्ष और श्राद्ध विधि करने का महत्व !

श्राद्ध शब्द की व्याख्या : ब्रह्म पुराण में श्राद्ध के संदर्भ में आगे दी हुई व्याख्या दी गई है ।
देश काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत् ।
पितृ नुदि्दश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ।।
अर्थ : देशकाल और योग्य स्थल में श्रद्धा और विधि से युक्त पितरों को उद्देशित कर ब्राह्मणों को जो दिया जाता है उसको श्राद्ध कहते हैं।
श्राद्ध विधि का इतिहास : श्राद्ध विधि की मूल कल्पना ब्रह्म देव के पुत्र अत्रि ऋषि की है । अत्रिऋषि ने निमी नामक अपने एक पुरुष वंशज को ब्रह्मदेव द्वारा बताई गई श्राद्ध विधि सुनाई । वह परम्परा आज भी चालू है । मनु ने पहली बार श्राद्ध क्रिया की, इसीलिए मनु को श्राद्ध देव कहते हैं । लक्ष्मण और सीता जी के साथ राम जब वनवास में गए और भरत से उनकी वनवास में भेंट हुई और उनको पिता के निधन की जानकारी मिली उसके पश्चात राम जी ने पिता का श्राद्ध किया ऐसा उल्लेख रामायण में है। ऋग्वेद
काल में समिधा और पिंड की अग्नि में आहुति देकर की हुई पितृ पूजा अर्थात् अग्नौकरण, पिंड की तिल से शास्त्रोक्त की हुई पूजा अर्थात् पिंड पूजा और ब्राह्मण भोज इस इतिहास क्रम से बनी हुई श्राद्ध की तीन अवस्थाएं हैं । सांप्रत काल में ‘पार्वण’ शब्द में यह तीनों अवस्थाएं एकत्रित हुई हैं । धर्मशास्त्र में यह श्राद्ध गृहस्थाश्रम के लोगों को कर्तव्य समझकर करना बताया है ।
पितृपक्ष में दत्त का नाम स्मरण करने का महत्व : दत्त देवता का नामजप करने से पूर्वजों को गति मिलने में और उनके कष्ट से रक्षण होने में सहायता होने से पितृ पक्ष में प्रतिदिन दत्त देवता का ज्यादा से ज्यादा नाम स्मरण करना चाहिए। पितृपक्ष में प्रतिदिन कम से कम 72 माला नामजप करने का प्रयत्न करना चाहिए । हमारे महान ऋषि मुनियों द्वारा हमें प्राप्त श्रद्धा रूपी अनमोल सांस्कृतिक सम्पदा को सुरक्षित रखने की सद्बुद्धि हम सभी को प्राप्त हो, सभी श्राद्ध विधि श्रद्धा से कर सकें और इस प्रकार पूर्वजों की और स्वयं की उन्नति हो, यही ईश्वर के चरणों में प्रार्थना है ।
DISCLAIMER: The author is solely responsible for the views expressed in this article. The author carries the responsibility for citing and/or licensing of images utilized within the text.