श्रीराम लला का छत्र चढ़ा है, भारत का है मान बढ़ा।

जले दीप अनगिनत मन मन्दिर में, अवधपुरी उत्सव है बड़ा॥१॥

अब भव्य बने प्रासाद राम का, देश-विदेश से भक्त जुटें।

बैठें सिंहासन झूलें पलना, शयन करें नित राम उठें॥२॥

हनुमान ने रोपा राम नाम का, पौधा सींचा तुलसी ने।

वट-वृक्ष बना छाया पाने, जल लाए नैनन कलसी में॥३॥

यह धर्म-प्रतिष्ठा का शुभ अवसर, त्रेता ज्यों आरम्भ अभी।

हैं मुदित देवगण-कागभुशुण्डी, सप्तर्षि-दिकपाल सभी॥४॥

अब राम-राम अविराम जाप कर, श्रद्धा का आवेग प्रबल।

उल्लास-प्रेम-विश्वास हृदय में, दिव्य प्रकाश तेज उज्ज्वल॥५॥

बलिदान किये कटु शब्द पिये हैं, भक्तों ने अपमान सहा।

अब प्राण धार कर दे दो उत्तर, उन्हें जो पूछें राम कहाँ॥६॥

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